रविवार, 8 सितंबर 2013

सुहाना सफर

अभी हाल में हल्द्वानी से दिल्ली की रेल-यात्रा (शताब्दी एक्सप्रेस) में मेरी बगल वाली सीट में एक १६-१७ वर्षीय जापानी लड़का भोला सा, मासूम सा, चिकना सा, आकर बैठा. उसकी शक्ल सूरत और पीताभ रंग देखकर मेरी श्रीमती ने कहा, “कोरियाई लगता है.” मैंने पूछने में देर नहीं की, “Hello, from which country are you?” वह बहुत देर तक सोचने के बाद बोला, “निप्पॉन”, यानि जापान. उसको देख कर मुझे अपने पौत्रों की याद आ गयी और उससे बातें करने का मन हो रहा था.

मुझे कभी जापान जाने का मौक़ा नहीं मिला. जापान देश के बारे में मेरी सामान्य सी जानकारी रही है कि जापान कई द्वीप समूहों का देश है, जहां की वर्तमान पीढ़ियाँ उच्च तकनीकी ज्ञान रखती हैं. मोटर वाहन, इलेक्ट्रोनिक्स उत्पाद, वस्त्र व रसायन जैसे महत्वपूर्ण उद्योग वहाँ हैं. आर्थिक दृष्टि से संपन्न राष्ट्र है. आम लोगों का जीवन स्तर काफी ऊंचा है.

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान धुरी देशों के साथ होकर मित्र देशों के विरुद्ध लड़ा था. हमारे प्रिय नेता सुभाषचन्द्र बोस जापान के मित्र थे और अंग्रेजों से देश को मुक्त करवाने के लिए आजाद हिंद फ़ौज बनाकर लड़ रहे थे, पर विश्वयुद्ध में धुरी देशों की हार हो गयी. अमेरिका ने परमाणु बम डाल कर जापान के दो बड़े शहर हिरोशिमा और नागासाकी ध्वस्त कर दिये थे. जापान को तब समर्पण करना पड़ा. सन २००३ में अपनी फिलीपींस यात्रा के दौरान मैंने वहाँ जापानियों द्वारा छोड़े गए युद्ध अवशेष तथा मारे गए जापानियों व अमरीकियों के स्मारक देखे हैं.

जिज्ञासावश कभी मैंने जापान के बारे में कुछ साहित्य अवश्य पढ़ा था. उससे मालूम था कि तीन बड़े द्वीपों सहित छोटे बड़े सब मिलाकर ६८०० द्वीप जापान देश को बनाते हैं. जहाँ अकसर भूकम्प और सूनामी आते रहते हैं. भूकम्प की मार की वजह से मकान लकड़ी के बने होते हैं. कहा जाता है कि जापानियों ने कई विधाओं में चीनी संस्कृति का अनुकरण किया है.

छठी-सातवीं शताब्दी में बौद्ध धर्म चीन होता हुआ यहाँ पहुंचा, और दसवीं शताब्दी तक बहुत लोकप्रिय हो गया था. आज जापान के ८५% लोग बौद्ध तथा शिन्तो (पुराने धार्मिक विश्वास वाले अनेक देवताओं के उपासक शिन्तो कहलाते हैं), शेष ईसाई व अन्य आस्था वाले हैं. 

जापान में राजा होता है, पर सत्ता में उसका कोई दखल नहीं होता है. उसके अधिकार सीमित हैं. ग्यारहवीं शताब्दी से ही तत्कालीन राजा ने खुद को राजकाज से अलग करके रखा था बाकी सब लोकतंत्रीय व्यवस्थाएं हैं. लोग ईमानदार व राष्ट्रप्रेमी हैं.

वर्षों पहले धर्मयुग नाम की हमारी हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका में मैंने किसी भारतीय साहित्यिक यात्री के जापान सम्बन्धी यात्रा संस्मरण पढ़े थे. उसमें उन्होंने लिखा था कि, “टोक्यो में जब ट्रेन में बैठे हुए अपने मित्र से उन्होंने कहा कि “यहाँ केले प्राप्य नहीं हैं,” तो उनकी बातें सुनकर एक जापानी व्यक्ति तुरन्त कहीं जाकर केले लेकर आया और बोला, “ऐसा फिर मत कहना कि जापान में केले नहीं मिलते हैं”.

ये दृष्टान्त बहुत अच्छा लगा कि जापानी लोग अपने देश की अस्मिता के प्रति कितने सावधान रहते हैं. इसके उलट हम यहाँ भारत में रोज सुनते/पढ़ते हैं कि विदेशी यात्रियों का सामान चुरा लिया गया है या उनको लूट लिया गया है.

मेरे बगल में बैठा वो जापानी लड़का कनखियों से मुझे देखता आ रहा था. अपना ब्रीफकेस ऊपर सामान वाले सेल्फ पर रख कर और एक छोटा बैग अपनी गोद में रख कर सहमा-सिमटा सा बैठा रहा. उसके पास एक बढ़िया टच स्क्रीन वाला मोबाईल फोन था, जिस पर हेड-फोन लगा कर कुछ सुन रहा था. मेरा मन उससे बतियाने को हो रहा था. मैंने बार बार उससे कुछ कुछ पूछने का प्रयास भी किया लेकिन लगा कि उसे अंग्रेजी या कोई भारतीय भाषा समझ में नहीं आती थी. इसलिए मैंने इशारों से समझाने की कोशिश भी की पर वह केवल सर हिला कर प्यारी सी मुस्कान के साथ अनमने उत्तर से दे रहा था. मैं और मेरी श्रीमती उसके उस भोलेपन पर मुग्ध थे.

इस गाड़ी में यात्रियों को नाश्ता व खाना भी परोसा जाता है. जब टमाटर के सूप के साथ ब्रेडरोल्स तथा मील्स-ऑन-ह्वील्स वाले भोजन का पैकेट आया तो उसने चारों ओर नजर डाल कर पैकेट खोला और सभी कटोरियों की फोटो खींच ली फिर खाना शुरू किया. वह इस भारतीय शाकाहारी भोजन को चख चख कर अजीब ढंग से खा रहा था. मैंने इशारों से बताने की कोशिश की कि परांठे को तोड़कर सब्जी लगा कर खाए पर शायद वह उस दिन दोपहर बाद तक भूखा ही था. सब्जी, दाल को अलग तथा परांठा, चावल को अलग से दही के साथ खा गया. उसको पेट भरने से मतलब था. हमारा मनोरंजन जरूर हो रहा था. इसी दौरान उसका एक हमउम्र साथी उससे कुछ कहने को आया वह थोड़ी टूटी फूटी अंग्रेज़ी जानता था. मैंने उससे भी जानकारी चाही तो उसने बताया कि वे लोग हिमालय देखने कौसानी तक गए थे.

उन लोगों को यहाँ का खाना कैसा लगता होगा, कहा नहीं जा सकता है क्योंकि जापानी लोग सी-फ़ूड तथा अन्य नॉनवेज के आदी होते हैं. ये भी कहा जाता है कि मीट, जिसे जापानी में ‘नीकू’ कहा जाता है, हरे धनिये की तरह हर नमकीन प्लेट का हिस्सा होता है. ये लोग भारतीय मसालों की बू भी पसन्द नहीं करते हैं.

बहरहाल हमारा ५ घंटों का मजेदार सफर खतम हो गया. उतरने से पहले मैंने उसको अपनी मिनरल वाटर की एक सील्ड बोतल दे दी तो वह बहुत खुश हो गया. उसने अपनी बोतल का सारा पानी पी लिया था. यद्यपि भाषा की समस्या होने के कारण उससे किसी विषय पर बात नहीं हो सकी, पर प्यार की भाषा आँखों से बोली जाती है. अपने बगल में उसकी उपस्थिति से पूरा सफर सुहाना रहा.
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7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बेहतरीन आलेख,आपका आभार।

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  2. मन के भाव चेहरे से और शरीर से व्यक्त हो जाते हैं।

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  3. लेकिन जापान में इस्लाम पर पूरी पाबंदी है इसलिए वहाँ इस्लाम से नफरत की जाती है.......और इसी कारण वहां मेहमान देशों के व्‍यक्तियों का सामान चोरी नहीं होता, लूट डकैती नहीं होती। अपने देश के प्रति हरेक नागरिक कर्तव्‍य बोध रखता है, उसकी अस्मिता को बचाए रखने के लिए उस व्‍यक्ति के लिए केले ले आता है जो कहता है कि जापान में केले नहीं मिलते। बहुत अच्‍छा संस्‍मरण।

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  4. आज की विशेष बुलेटिन तीन महान विभूतियाँ और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

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