सोमवार, 2 सितंबर 2013

कश्मकश

कभी कभी परिस्थितियाँ इन्सान को बचपन में ही सयाना बना कर जिम्मेदारियां थमा देती हैं. मोहन भगत जब सात साल का था, तभी पिता का साया सिर से उठ गया. उस समय उसकी दो छोटी और दो बड़ी बहनें सभी नाबालिग थी. इसके अलावा घर में पाँच बड़ी सयानी अनब्याही बुआयें भी थी, पर माँ बहुत जीवट वाली थी. परिवार की गाड़ी रुकी नहीं. बुरा समय भी कट जाता है, हिम्मत रखनी होती है.

इन दिनों मोहन भगत बड़ी कश्मकश में जी रहा है. दरअसल उसका जीवन बीमा एजेंसी का काम बिलकुल सुस्त चल रहा है. एजेंसी लेते समय तो उसको बड़ा जोश व उत्साह था, पर धीरे धीरे वह कम होता गया क्योंकि एलआईसी ने इतने सारे एजेंट बना दिये कि हर गली-मोहल्ले में दो दो एजेंट मिल जायेंगे और वे प्रतिस्पर्धा में ग्राहकों को बीमा कराने पर तीन तीन महीनों की किश्त अपनी जेब से देकर पटा लेते हैं. मोहन भगत की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि उनकी तरह लम्बे समय के लिए निवेश करके बैठा रहे. इधर पत्नी मधु का तकाजा है कि उसके लिए कम से कम एक लाख रुपयों का इन्तजाम किया जाये. वह पति से कहती है, “आपकी कमाई से तो घर का खर्चा चल नहीं रहा है इसलिए मैं अपना ब्यूटी पार्लर खोल कर कमाई करूंगी.” वह अपने ब्यूटीशियन कोर्स के डिप्लोमा का बार बार हवाला देकर दबाव बना रही थी.

घर में ७८ वर्षीय माँ है जो उम्र की इस दहलीज पर सुनने की क्षमता लगभग खो चुकी है और आँखों में भी मोतियाबिन्द के ऑपरेशन के बाद मोटा चश्मा चढ़ाये रहती है. आज वह घर की बैठक में वह बहू व मोहन की बातचीत में उनके हावभाव व होंठों की क्रियाओं की बहुत देर से संज्ञान लेने की कोशिश कर रही है. उसको अंदाजा हो गया है कि जरूर कोई खींचतान वाली बात चल रही होगी.

पत्नी मधु व्यंग्यात्मक अंदाज में कह रही थी, “ससुर जी की जोड़ी हुई ग्यारह बीघा जमीन में से आपने अब तक दस बीघा बेच खाई है. इस एक बीघे में मकान भी है और गाय का बाड़ा भी. इतनी सी जगह में क्या होता है?” मोहन को ये बात चुभ गयी. वह तल्ख स्वर में बोला, “बेच खाई क्यों बोल रही हों? मैंने कोई जुआ थोड़े ही खेला है. पाँच बुआओं और चार बहिनों की, और एक अपनी, कुल दस शादियाँ तो करनी ही थी. हर बार एक बीघा बेचना मजबूरी थी.”

मधु बोली, “कुछ अपने बेटों के लिए भी छोड़ना था. कल बड़े होंगे तो कोसेंगे.”

मोहन बोला, “तू इनकी चिंता मत किया कर. बुजुर्गों ने कहा है, ‘पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय’".

मधु ने कहा, “ये सब कहने की बातें हैं. आप हर शादी पर एक बीघा जमीन बेचते रहे, और जब अपने बच्चों की शादी करनी होगी तो आपके पास कुछ भी बचा हुआ नहीं होगा. इसलिए मैं कह रही हूँ कि आजकल ब्यूटी पार्लर खूब फलफूल रहे हैं. आप मेरे लिए जल्दी एक लाख रुपयों का इन्तजाम कर दीजिए.”

मोहन बोला, “तेरे पास १२ तोले सोने के जेवर हैं. उनमें से तीन तोला बेच दे आजकल सोने का भाव ३०,००० से ऊपर चल रहा है.”

ये सुन कर मधु रोने लगी और रोते हुए बोली, “अब मेरे जेवरों पर आपकी नजर है. इनको बेचकर भीख का कटोरा पकड़ लो.”

वातावरण बहुत गंभीर हो गया. सामने बैठी माँ ये सब देखकर कश्मकश मे थी कि ये हो क्या रहा है. जोर लगा कर बोल उठी, “क्या हो गया है? किस बात पर झगड़ रहे हो? मैं भी तो सुनूं....”

मोहन माँ के नजदीक जाकर उसके कान पर जोर जोर से बोला, “खर्चा नहीं चल रहा है. मधु पार्लर खोलना चाहती है. एक लाख रूपये चाहिए, कहाँ से लाऊँ?”

माँ को मानो बिजली का करंट लग गया हो. वह झटके के साथ उठी मोहन का हाथ थाम कर अपने कमरे में ले गयी अपने बक्से की चाबी देते हुए बोली, “इसको खोल.” मोहन ने आज्ञाकारी बेटे की तरह बक्सा खोला. माँ ने उसमें से कपड़ों के बीच छुपाए हुए अपने जेवरों का डिब्बा निकाला और उसे लेकर वापस बैठक में आ गयी. डिब्बा बड़ी मुश्किल से खुला क्योंकि लम्बे समय से खोला नहीं गया था. उसमें से अपने गुलुबन्द, नथ, कर्णफूल आदि सभी सोने के पुराने जेवर जिनका वजन लगभग दस तोले होगा बहू के हाथ में रख दिये फिर बोली, “ये मेरे किसी काम के नहीं हैं. तू इनसे अपना पार्लर खोल ले. कम पड़े तो अभी चांदी भी पड़ी है. घर में मुँह बिगाड़ कर रहना अच्छा नहीं है.”

माँ के इस स्नेहासिक्त व्यवहार से बेटा और बहू दोनों की आँखें भर आई.

मधु बोली, "माता जी, आप अपना जेवर अपने पास रखो. मेरे पास भी बहुत है. अभी सिर्फ तीन तोले से सब काम बन जाएगा."

मोहन ने मधु को बताया कि माँ के बक्से में जार्ज पञ्चम के जमाने के सौ सिक्के भी रखे हुए हैं.

मधु बोली, “नहीं, नहीं, माँ के रुपयों को भी मत निकालना. मेरे पास चूडियों के और झुमकों के दो दो सेट हैं. आप इनको बेच आइये. माँ ठीक कहती है, घर में अशांति नहीं होनी चाहिए.”

मोहन भगत को राहत भरी राह तो मिल गयी, पर वह ये भी सोचने लगा कि आजकल छोटे उद्यमों के लिए बैंक भी खुले हस्त लोन दे रहे हैं. उसी क्षण उसने यह भी सोचा कि बैंकों की ब्याज दर तो बहुत ऊँची होती है. सारी कमाई ब्याज में चली जायेगी. ऐसा क्यों ना किया जाये कि जेवरों को रेहन रखा जाये. अब बात सुलझ गयी है तो रुपयों का इन्तजाम हो ही जाएगा.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. माँ सच ही जीवट वाली थीं .... घर आपस के प्रेम और सौहार्द से ही चलता है ।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ....!!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (03-09-2013) को "उपासना में वासना" (चर्चा मंचःअंक-1358) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. जार्ज पञ्चम के जमाने के सौ सिक्के...........!!!!

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  4. सोना गाढ़े समय में सदा से ही काम आता रहा है।

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