बुधवार, 11 सितंबर 2013

गुड़ खाया कीजिये

जब तक चीनी बनाने का आविष्कार नहीं हुआ था, लोग गुड़ खाया करते थे. गुड़ का आविष्कार किसने और कब किया, इस बारे में कोई इतिहास उपलब्ध नहीं है. लेकिन ये बात पक्की है कि प्रकृति ने ‘गन्ना’ या ‘ईख’ की सौगात अनादि काल में ही मनुष्यों को दे दी थी.

मनुष्य अपने ज्ञान के आधार पर प्रकृति का दोहन करता चला आ रहा है. गन्ना के अलावा ताड़, शकरकंद, अंगूर, अनार, केला, आम आदि मीठे फल तथा शहद मिठास के श्रोत हैं, पर जो बात गुड़ में है, वह कहीं नहीं है.

कई सदियों पूर्व गन्ना व्यवसायिक स्तर पर पैदा किया जाने लगा था, लेकिन तब इसके रस को पका कर गुड़ बनाया जाता था. चीनी को लोग नहीं जानते थे.

बहुत पुरानी बात भी नहीं है; मुझे याद है मेरे बचपन में हमारे गाँव में कार्तिक के महीने में जब सब लोग गेहूं बोने से फुर्सत में हो जाते थे तो ‘चरखी-कोल्हू’ जोत लिया जाता था और गाँव के लोग बारी बारी से अपना गन्ना पेराई के लिए लाते थे. रस को बड़ी बड़ी चौड़ी चाशनियों में पकाया जाता था. उसके खौलने पर उसमें अपद्रव (मैला) ऊपर तैरने लगता था, जिसे छलनियों से निकाला जाता था. उसमें दूघ तथा घर का बनाया हुआ साफ़ चूना भी थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता था. इससे गुड़ की रंगत बिलकुल साफ़ - सफेद हो जाती थी. जब रस पकते पकते गाढ़ा हो जाता था तो साफ़ पट्टियों में फैला कर ठंडा किया जाता था. उसके पूरी तरह ठंडा होने से पहले पिण्डलियाँ (भेलियाँ) बना ली जाती थी. कभी कभी जब ज्यादा पक जाता था तो ये बिलकुल चॉकलेट सा हो जाता था, जो दाँतों से मुश्किल कटता था. अगर शीरा बना कर रखना हो तो तरल अवस्था में कनस्तरों में डाल लिया जाता था.

ताजा खाने के लिए गुड़ की गुणवत्ता बढ़ाई जाती थी. उसमें सूखे मेवे, मूंगफली दाना, सौंफ, इलायची भी डाल दी जाती थी. ताजे गुड़ की वह प्यारी खुशबू पूरे पेराई के मौसम में पूरे गाँव में महकती थी. मेरे जेहन में अभी भी वह बसी हुई है. मुझे लगता है ये सब अब गुजरे जमाने की हकीकत बन कर रह गई है. आज गुड़, खांडसारी, व बूरा-शक्कर कई छोटे बड़े उद्योगों में मशीनों से बनाया जाता है. गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में बड़े बड़े चीनी के कारखाने लगे हुए हैं, जो अक्टूबर से अप्रेल तक पेराई करके चीनी, राब तथा इथाइल अल्कोहॉल का उत्पादन करते हैं. अंग्रेजी शासन काल में एक बार चीनी उत्पादन के पक्ष में सरकार ने गुड़ बनाने पर पाबंदी भी लगा दी थी, लेकिन इसका भारी विरोध हुआ.

चीनी और दुग्ध उत्पादों से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ बनाई जाती हैं, लेकिन चीनी में वो बात कहाँ जो गुड़ में होती है.

गुड़ में ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लौह तत्व तथा पोटेशियम-फोस्फोरस जैसे कई महत्वपूर्ण तत्व होते हैं. गुड़ को गुणों की खान कहा गया है. कोयले व सिलिकॉन की धूल से फेफड़ों को जो नुकसान होता है, उसे गुड़ रोकता है. इसीलिये कोयला, सीमेंट, या सिलिकॉन वाले उद्योगों में काम करने वालों को गुड़ खाना अनिवार्य बताया जाता है.

हमारे उत्तर भारत में मुजफ्फरनगर में गुड़ की सबसे बड़ी मंडी है. दक्षिण भारत में ताड़ से भी गुड़ बनता है, पर गुणों की दृष्टि से ईख का गुड़ श्रेष्ठ होता है. आज भी हमारे भारतीय ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में गुड़ का प्रयोग कई प्रकार से होता है, जैसे गुड़-तिल के लड्डू, गुड़ की रेवड़ी, गुड़ के गजक, मालपुए, गुलगुले, पँजीरी आदि. मराठी लोग गुड़ का बूरा डाल कर मीठी पूरण पूड़ी बनाते हैं. गुजराती लोग दाल में गुड़ डाल कर उसे मीठी बनाते हैं. मैंने अपने बचपन में घी+गुड़ के साथ रोटी खाई है. मक्के या मडुवे की रोटी के साथ गुड़ का स्वाद लेना हो या भुने हुए चनों के साथ गुड़ खाना हो तो उसकी अनुभूति शब्दों में बयान नहीं हो पा रही है.

आज हमारे देश में भी आम लोगों का (विशेष कर शहरों में) जीवन शैली पूरी तरह बदल गयी है. नतीजन करोड़ों लोग मधुमेह के शिकार हैं या होते जा रहे हैं. उन सबको गुड़ अथवा शर्करायुक्त पदार्थों से परहेज करना चाहिए. उनके लिए कम कैलोरी वाले आर्टीफीशियल स्वीटनर बाजार में उपलब्द्ध हैं, जिनसे वे अपनी चाय या भोजन में मिठास ला सकते हैं. 

बहरहाल स्वस्थ लोग तो गुड़ का आनंद ले ही सकते हैं.  
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12 टिप्‍पणियां:

  1. आजकल गुड का चलन तो धीरे धीरे कम होता जा रहा है !

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  2. आज वो गुड कहाँ जो पहले मिलता था ..... फिर भी गुड प्रेमी गुड खाते हैं और पुराने दिनों को याद करते हैं ...

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (12-09-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 114" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  4. आपकी यह प्रस्तुति 12-09-2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

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  5. अच्‍छी रोचक और मिठासपूर्ण जानकारी।

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  6. सच कहा आपने, पहले गुड़ को उत्सवीय आकार देकर बनाया जाता था, अब सब औद्योगिक हो चला है।

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  7. स्वास्थ्य सचेत लोग फिर से गुड़ खाने लगे हैं ,ब्राउन शुगर भी। गुड़ चने तीन महीने खाओ हिमोग्लोबीन तीन पाइंट बढाओ। लौह तत्व का भी अच्छा स्रोत है गुड़।

    लोक कहावतों में भी गुड़ का अपतिम स्थान है -आदमी गुड़ न दे गुड़ जैस बात तो कह दे ,गुड़ खाय गुलगुलों से परहेज़ ,गुरु गुड़ ही रह गया ,चेला शक्कर है गया।

    लड़की को लड़का होने पर यानी आपके नाना बन ने पर लड़की के सुसरालिये क ई इलाकों में आज भी गुड़ की भेली भेजते हैं नाना के लिए।

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  8. गुड़ में ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लौह तत्व तथा पोटेशियम-फोस्फोरस जैसे कई महत्वपूर्ण तत्व होते हैं. गुड़ को गुणों की खान कहा गया है. कोयले व सिलिकॉन की धूल से फेफड़ों को जो नुकसान होता है, उसे गुड़ रोकता है. इसीलिये कोयला, सीमेंट, या सिलिकॉन वाले उद्योगों में काम करने वालों को गुड़ खाना अनिवार्य बताया जाता है.
    बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!गणेशोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें.
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन

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  9. गुड़ की उपयोगिता बताती उपयोगी रचना |
    आशा

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  10. पुरानी कहानियों में तो कोई अतिथी आया तो उसे गुड और पानी ही दिया जाता था थकान मिटाने के लिये।
    अचछा आलेख।

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