सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

कड़ुवा चौथ

कैंसर का रोग कोई एक दिन में पैदा नहीं होता है, और ना ही ये संक्रमण से फैलता है. इसके होने के बहुत से कारण अभी भी ठीक से मालूम नहीं हैं, पर अनेक संभावित कारण जरूर मालूम हो चुके हैं. मुँह, गला, फेफड़ा, या आमाशय के कैंसर के लिए सीधे तौर पर तम्बाकू को जिम्मेदार ठहराया जाता है. सर्वे के आँकड़े इसे सिद्ध करते हैं. इसीलिये इस विषय में दुनियाभर के सभी देश व स्वास्थ्य संगठन अपने नागरिकों को जोर देकर चेतावनी देते रहते हैं कि ‘तम्बाकू सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकर होता है.’ लेकिन जिन लोगों को तम्बाकू की लत लग जाती है, उन पर चेतावनियां तब तक बेअसर रहती हैं, जब तक वे बीमारी की जकड़ में नहीं आते हैं.

बाबूलाल यादव की अच्छी भली गृहस्थी चल रही थी. नौकरी से रिटायरमेंट भी ज्यादा दूर नहीं था. बेटा-बेटी दोनों सयाने हो गए, पढ़ाई पूरी कर ली, तथा उपयुक्त नौकरी की तलाश कर रहे थे. सुलक्षणी पत्नी विद्याधरी बच्चों की नौकरी व शादी-ब्याह के सपने संजोये हुए आम भारतीय मध्यवर्गीय गृहिणी की तरह पूरी तरह पति पर आश्रित थी.

बाबूलाल यादव तम्बाकू-खुशबूदार किमाम लगे पान खाने का शौक़ीन था. दिनभर में दो पान तो जरूरी होते थे. घर के नजदीक पनवाड़ी का खोमचा था, सो उपलब्द्धता भी आसान थी. कहते हैं कि ‘जैसी हो होतव्यता, तैसी आवै बुद्धि’. ऐसा ही हुआ. तम्बाकू सेवन के खतरनाक परिणाम जानते/सुनते हुए भी उसने चेतावनियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. परिणामस्वरूप गला खराब रहने लगा. खारिश से शुरू हुई तकलीफ खाँसी, बुखार, गला दर्द तक जब बढ़ गया, तब डॉक्टर की शरण ली. डॉक्टर होशियार था. अलामात देखते ही बाबूलाल को ई.एन.टी. स्पेशलिस्ट के पास भेज दिया, जिसने तुरन्त बायोप्सी करवाने की सलाह दी.

बायोप्सी में मैलिंग्नैन्सी की पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर पति-पत्नी दोनों के हाथ पाँव फूल गए क्योंकि कई कैंसर से पीड़ित लोगों की हालत उन्होंने देखी थी. अब जाकर बाबूलाल को तम्बाकू के विरुद्ध चल रहे अभियान का महत्व समझ में आ रहा था. उसको ये भी मालूम हो रहा था कि अन्जाम क्या होने वाला था. जीने की उम्मीद में आदमी आख़िरी साँस तक ईलाज कराता है. उसे रुग्णावस्था में मध्यप्रदेश के ग्वालियर स्थित कैंसर अस्पताल में ले जाया गया. बड़ी सिफारिशें लगाकर वहाँ भर्ती कर दिया गया. चूँकि भोजन नली चोक होने लगी थी इसलिए नाक में एक रबर नाली डालकर सिरिंज द्वारा तरल भोजन डाला जाने लगा. कीमोथेरेपी के सेक दिये जाने लगे, जिससे सारे बाल झड़ गए तथा बेहद कमजोरी हो गयी. डॉक्टर बता रहे थे कि लिम्फ सेल और प्लेटलेट्स की मात्राएँ खतरनाक स्थिति तक पहुँची हुई हैं.

इधर नौकरी से रिटायरमेंट की तारीख आ गयी इसलिए अस्पताल से छुट्टी लेकर बीमारी हालत में ही एक दिन के लिए ड्यूटी जॉइन करके ऑफिस सम्बन्धी बहुत सी कागजी कार्यवाही पूरी करनी पड़ी. पुन: अस्पताल जाने से पहले बाबूलाल ने विद्याधरी से कहा, “देख, अब आगे ईलाज मत करवा. ये बीमारी ठीक होने से तो रही और तू खर्चा करते करते सड़क पर आ जायेगी.”

विद्याधरी के पास जवाब में आंसुओं के सिवाय कुछ भी नहीं था. वह बोली, “ईलाज कैसे बन्द कर सकते हैं. आप खर्चों की बिलकुल चिंता न करें. आपका ही कमाया हुआ रुपया है. रूपये आपकी जान से बड़े थोड़े ही हैं.” इस तरह दम दिलासा देते हुए पुन: अस्पताल की शरण में आ गए. पर बाबूलाल की हालत दिन पर दिन खराब होती गयी. उसका पूरा पाचन तन्त्र बिगड़ गया था. साँस लेने में तकलीफ होने लगी तो श्वसन नली में छेद करके गर्दन में से अलग नली लगा दी गयी. एक दिन डॉक्टर ने विद्याधरी को अलग से बुलाकर कह दिया, “तुम इसे घर ले जाकर जितनी सेवा कर सको करो. यहाँ अब कोई सुधार होने वाला नहीं है. तुम्हारा बिल यों ही बढ़ता जा रहा है.”

इस प्रकार तीन महीने अस्पताल में रख कर बाबूलाल को बुरी हालत में घर वापस लेकर आ गए. दवाओं व अस्पताल के खर्चे का भुगतान करने में उसकी ग्रेच्युटी व प्रोविडेंट फंड का सारा रुपया लग गया. घर में सब तरफ उदासी थी. मित्र तथा रिश्तेदार मातमपुर्सी के लिए आने लगे. ऐसा दिन भगवान किसी को न दिखाए, पर जीवन-मृत्यु तो इंसानों के वश में नहीं होता है. बाबूलाल की हालत बद से बदतर होती गयी. मुँह से दुर्गन्ध आने लगी. बेचारी विद्याधरी उसकी हर कराह पर जागती और शरीर को सहलाती रहती थी. शारिरिक कष्ट तो मरीज को खुद सहना पड़ता है, उसे कोई बाँट नहीं सकता.

इस बीच नवरात्र आये, दशहरा आया, विद्याधरी सभी देवी-देवताओं से अपने पति की सलामती की गुहार लगाती रही, पर उसके पति की वेदना घटने का नाम नहीं ले रही थी. वह कई बार चेतनाशून्य रहने लगा. बिस्तर खराब तो वह बहुत दिनों से करने लगा था. मरीज से ज्यादा तीमारदार की हालत खराब होती है. कभी कभी तो बाबूलाल की तड़प को देखकर वह सोचने लग गयी कि ‘परमेश्वर अब उसको मुक्ति दे दे तो अच्छा होता’.

आज करवाचौथ है. सभी सुहागिनें सजी-संवरी हाथों में मेहंदी लगाए हुए अपने अपने पतियों की लम्बी उम्र की दुआएं माँग रही हैं. गत वर्ष इस दिन विद्याधरी भी उल्लासपूर्ण थी, पर इस बार मृत्युशय्या पर पड़े पति को देखकर आँखें भर आ रही हैं. कुछ दिनों पहले जब बाबूलाल होश में था और खिसिया खिसिया कर कुछ बोल ले रहा था तो उसने विद्याधरी से कहा था, “मैं मरने लगूं तो एक तम्बाकूवाला पान जरूर मेरे मुँह में डाल देना.” पता नहीं उसने ये बात किस तुफैल में कही थी, विद्याधरी को लगा कि उसको तम्बाकू की तलब बाकी थी. अन्तिम इच्छा समझ कर वह डरी डरी सी पनवाड़ी के खोमचे तक गयी और उससे एक तम्बाकू वाला पान लगाने को कहा. पनवाड़ी को क्या मालूम था कि ये बाबूलाल की अन्तिम इच्छा. उसने तो खुश होकर तम्बाकू-किमाम का पान लगाया, और विद्याधरी से बोला, “बाबू जी को हमारी याद आ ही गयी.”

ठीक उसी समय जब बाहर चन्द्रदर्शन हो रहे थे तो विद्याधरी ने अपने पति के मुँह में पान डाल दिया और अपने फर्ज से मुक्त हो गयी.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. अवसान की संवेदना, शरीर की वेदना।

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  2. दुखद परिस्थिति को दुनिया भूल जाया करती है, बाबूलाल यादव या कोई भी सशरीर रहे न रहे किसी को किसी तरह का फर्क नहीं पड़ता। जीवन अवसान के बाद भी चलता रहता है। कुल मिला कर इंसान शरीर से बहुत कमजोर है इस आधुनिक युग में तो यही सिद्ध हो रहा है।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २९ /१० /१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है ।

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  4. एक कटु सत्य जिसे देखकर भी सबक नहीं लेते है लोग ...
    लत साथ ही जाती हैं

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