बुधवार, 4 जुलाई 2012

काली जीभ

यह विश्वास है कि कुछ लोगों की जीभ काली होती है. वे अनायास जो कह डालते हैं, वह बाद में सच साबित हो जाता है. खरही गाँव की रूपा ताई की जीभ भी इसी तरह बदनाम थी.

लोकमणि जब छोटा था तो उसको इस तरह की बातों का कोई सरोकार नहीं था. स्कूल मे गर्मियों की छुट्टियां हो जाने पर गाँव के बच्चे अपने जानवरों को चराने के लिए पातळ के जंगल की तरफ ले जाने मे बहुत खुश रहते थे. लोकमणि भी अन्य ग्वालों के साथ अपनी दो गायों, दो बैलों, व चार बकरियों को मजे से हांकते हुए यहाँ आ जाता था. बच्चे खूब मस्ती करते हुए जंगल में दिन बिता आते थे. जिन परिवारों मे किशोर लड़के–लड़कियां नहीं होते थे, उनके बड़े-बूढ़े ग्वाले बने रहते थे. ग्वालों को जानवरों की रखवाली भी करनी होती थी. शाम होते होते जानवर खुद गाँव का रुख करने लगते थे.

लोकमणि को जानवरों को चराने के साथ साथ चिड़ियों के घोंसलों को ढूँढने और उनको छेड़ने में ज्यादा मजा आता था. उसने न जाने कितने घोंसले तोड़ डाले तथा गुलेल से चिड़ियों को निशाना बनाया होगा, इसका कोई हिसाब नहीं है. रूपा ताई उसकी इन हरकतों पर टोकती रहती थी, पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता था. ताई कहती थी, इन बेजुबानों को मत मारा कर इसका बड़ा पाप लगता है. लोकमणि के लिए तब पाप-पुण्य जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता था. ताई ने एक बार कर्कश स्वर मे डांटा भी, अरे, मत छेड़ इन अण्डों को, तू निपूता रह जाएगा. पर वह कहाँ समझता, लोकमणि तो चिड़ियों का दुश्मन बन जाता था.

एक बार जब लोकमणि ने एक घुरड (हिरन) के छोने पर पत्थर दे मरा तो उसकी कमर ही टूट गयी थी. घुरड का बच्चा बहुत मिमियाता, कराहता रहा. ताई ने जब देखा तो गुस्से मे बोली, एक दिन तेरी भी कमर ऐसे ही टूटेगी.

ये सब बचपन की बातें थी. बचपन बीत गया, लोकमणि गाँव से शहर मे आ गया. स्कूल के बाद कॉलेज से बी.एससी. करके ग्राम सेवक की नौकरी पर लग गया. व्याह हो गया. सुख भरे दिन कब बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता है.

एक कसक रह गयी कि व्याह के कई वर्षों के बाद भी कोई औलाद नहीं हुई. घर आँगन मे बच्चे की किलकारी किसे नहीं सुहाती है? देशी टोटके, पूजा-पाठ के अतिरिक्त डाक्टरी ईलाज भी खूब कराया, पर परिणाम नहीं बदला. रह रह कर लोकमणि को रूपा ताई की काली जीभ की बातें याद आती थी, ताई का वचन इस तरह फलित होगा यह सोचा भी नहीं था.

प्रकृति से हँसमुख, परिचितों/अपरिचितों का सहायक, हर हाल में खुश रहने वाला लोकमणि अपने अकेलेपन में रूपा ताई की दुत्कारती आवाज को याद करके कई बार सिहर जाता था. उसे याद था कि घुरड के बच्चे की कमर टूटने के बाद ताई ने एक और बात कही थी कि, तेरी भी कमर टूटेगी. काली जीभ की इस बात से आतंकित रहते हुए लोकमणि कभी भी साइकिल या मोटर-साइकिल की सवारी मे नहीं बैठा. और हमेशा ही अपनी हिफाजत के प्रति सजग रहता था.

दो साल पूर्व नौकरी से रिटायर होने के बाद वह छोटी हल्द्वानी के पास एक सुविधापूर्ण घर बना कर रहने लगा. पहाड़ से उसके अनेक रिश्तेदार एवँ परिचित परिवार वहीं आकर बस गए थे. घर से करीब आधा किलोमीटर दूरी पर एक पुराना दोस्त दीवानसिंह रहता है. उसके लड़के के विवाहोत्सव मे दावत खाकर रात ११ बजे अकेले पैदल घर लौट रहा था कि नहर के किनारे पर पैर फिसला और वह नहर मे जा गिरा. ये अच्छा हुआ कि उस दिन नहर मे पानी की बारी नहीं थी,अन्यथा बह जाते. गिरने के बाद उन्होंने उठने की कोशिश की, पर वे उठ नहीं सके, कमर से नीचे का शरीर पूरी तरह सुन्न पड़ गया. आधी रात को सुनसान पगडंडी पर कोई आवाजाही नहीं थी, कौन सहायता करता? यों सुबह होने तक वहीं पड़े रहे.

चिंतातुर पत्नी सुबह उजाला होते ही उनकी तलाश मे निकली तो उनको सूखी नहर मे कराहते हुए पाया. बदन इतना भारी लगा कि वह उसे उठा नहीं पाई, अत: गाँव मे जाकर पड़ोस में खबर की तब तीन चार लोगों ने मिलकर उनको मुश्किल से निकाला. हल्द्वानी लाकर ऑर्थोपेडिक सर्जन को दिखाया. १५ दिन भर्ती रहे, जब कोई फ़ायदा नहीं मिला तो नई दिल्ली AIMS में ले गए. वहाँ सारी जांच पड़ताल हुई, ईलाज चला, पर लकवाग्रस्त हिस्सा वैसा ही रहा.

वापस घर लाये गए, दो वर्षों से खाट पर पड़े हैं, शरीर बहुत भारी थुलथुल हो गया है, पीठ पर बेडसोर हो गए हैं. पड़े पड़े रूपा ताई की आत्मा को कोसते रहते हैं. रूपा ताई तो खुद कब की दूसरा जन्म लेकर कहीं और बेजुबान प्राणियों की हिमायत की मुहिम चला रही होगी.
                                              ***

6 टिप्‍पणियां:

  1. पुरुषोत्तम पाण्डेय जी, आपकी यह कहानी बहुत अच्छी लगी। बचपन में माँ हमें किसी भी प्राणी को कष्ट देने से रोकने के लिए ऐसी ही बातें कहती थीं कि जो उस प्राणी के साथ घट रहा है वही सब हमारे साथ भी घट सकता है।

    रूपा ताई की बातें यदि लोकमणि को कहानी के रूप में सुनाई समझाई गईं होतीं तो शायद वह समझ जाता।
    घुघूती बासूती

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  2. काली जीभ वाले को गाँव में "कल जीभा" कहा जाता है तथा लोग डरते हैं कि उसके मुंह से कोई ऐसी वैसी बात न निकल जाए।

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  3. औरों को कष्ट देने के लिये कोई न कोई सजा तो प्रकृति ने निश्चित कर रखी होगी..

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