रविवार, 25 नवंबर 2012

नामकरण के रुपये

हम सुनते, पढ़ते, और अनुभव करते रहे हैं कि एक राजहठ होता है, एक त्रियाहठ होता है और एक बालहठ भी होता है. हमारे देश में तो अब राजा नहीं रहे, पर जब थे तो उनमें बहुत से फितूरी या हठी हुआ करते थे. वे सर्वशक्तिमान थे इसलिए निरंकुश होते थे. उनके हठ राजसी होते थे, जिसका कोई तोड़ नहीं होता था. त्रियाहठ बहुत संवेदनशील और प्रतिशोधात्मक हुआ करते हैं इसलिए खतरनाक भी माना जाता है. जहाँ तक बालहठ की बात है यह बहुत मनोरंजक व गुदगुदाने वाले होता है.

मैंने एक पत्रिका में यह मजेदार किस्सा पढ़ा कि रेल यात्रा के दौरान एक प्यारा सा ५ वर्षीय बालक घी-रोटी खाने की जिद पर अड़ गया. रोटी तो थी पर घी कहाँ से लाते? बच्चे ने पूरे डिब्बे को सिर पर उठा लिया. मुंहलगा बच्चा था, डांट भी नहीं पा रहे थे. माँ-बाप परेशान हो गए. इतने में एक तीव्रबुद्धि सहयात्री को तरकीब सूझी. उसने तकिये के अन्दर से थोड़ी सी रुई निकालकर रोटी पर रख दी, माँ ने रुई पर रोटी रगड़कर घी-रोटी के रूप में बच्चे के मुँह में ग्रास दिया तो उसने प्रसन्नतापूर्वक रोटी खाई. इस दृश्य को देख रहे सभी यात्री लोट-पोट हुए बिना नहीं रहे.

मेरे घर पर मेरी पौत्री संजना का जब नामकरण संस्कार हुआ तो सभी नजदीकी इष्टमित्रों व पड़ोसियों को प्रीतिभोज पर आमन्त्रित किया था. बहुत बढ़िया ढंग से कार्यक्रम समपन्न हुआ. आजकल के दस्तूर के मुताबिक़ बालिका को शुभाशीषों के साथ रुपयों वाले लिफाफे भी मिले. शाम को उन रुपयों का हिसाब करते हुए धन देने वालों की लिस्ट बनाई जा रही थी क्योंकि यह सामाजिक दस्तूर होता है, जब उनके परिवारों में भी कोई शुभकार्य होगा तो प्रतिदान करते समय लिस्ट देख ली जाती है.

जब नोट गिने जा रहे थे, तो तब सात-वर्षीय पौत्र सिद्धान्त गौर से देख रहा था. उसने उसमें से कुछ रुपये लेने चाहे तो मैंने उसको बताया कि “ये रुपये संजना के नामकरण में आये हुए हैं. इसलिए ये उसी के हैं.” इस बात पर उसने प्रश्न किया कि “मेरे नामकरण पर पर भी तो रूपये आये होंगे, वे कहाँ हैं? मुझको मेरे रूपये चाहिए.”

वह जिद पर आ गया कि "मेरे रूपये अभी दो. अभी चाहिए.” स्वभाव से भी वह तेज रहा है. उसके माँ-बाप ने उसे समझाना चाहा पर बालहठ था वह अड़ गया. मुझे एक तरकीब सूझी और मैंने अपने बैंक की पुरानी चेक बुक का काउंटर फोलियो अलमारी से निकाल कर उसको दिया और कहा कि "तुम्हारे नामकरण के रूपये बैंक में जमा हैं. इस चेक बुक से तुम जब चाहो निकाल सकते हो.”

बैंक का नाम आते ही उसने उत्सुकता से पूछा, “इसमें कितने रूपये हैं?” मैंने उसे बताया कि “बैंक में तो रुपये बढ़ते रहते हैं. अब तक एक लाख तो हो ही गए होंगे.”

सिद्धान्त चेक बुक पाकर बहुत खुश हो गया क्योंकि अपने नामकरण का खजाना उसे मिल गया था. अब जब कि वह सयाना हो गया है, इस बालसुलभ प्यारे संस्मरण को मैं मौके-बेमौके उसे सुनाता हूँ तो वह भी  मुस्कुराए बिना नहीं रहता.

***

7 टिप्‍पणियां:

  1. भाई साहब आप बहुत जानदार चीज़ें किस्सों पर आधारित वृत्तांत लिए आतें हैं जो खासे बोध परक और

    हाज़िर ज़वाबी लिए होतें हैं .आप हमने भी प्रत्युत्पन्न मति बना के छोड़ेंगे .आभार आपकी सद्य टिप्पणियों

    का .

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  2. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 26-11-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. बहुत आसानी से बहल भी तो जाते हैं ,भोले-भाले बच्चे !

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  4. आपके संसमरणों को पढ कर बालगोपाल के
    हठ याद आ गये.

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