शुक्रवार, 21 जून 2013

नया दौर

जो लोग अपने जीवन में कुछ बड़ी उपलब्द्धि हासिल नहीं कर पाते हैं, वे अपने बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि उस ऊँचे मुकाम तक पहुंचें, जो कभी उनके अपने कल्पनालोक का लक्ष्य था, पर ऐसा हमेशा कहाँ हो पाता है? उनको अपने ही आत्मजों के साथ नई सामाजिक परिवर्तनों में व्यवस्थित होने में बहुत कठिनाई भी होती है क्योंकि पुराने संस्कार बहुत गहरे तक पैठ बनाए रहते हैं.

यशोदानंदन पन्त एक इंटर कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक हैं और अगले कुछ महिनों में रिटायर होने वाले हैं. उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अम्बालिका वहीं आस-पास अल्मोड़ा शहर के ही एक प्राथमिक पाठशाला में प्रधानाध्यापिका हैं. उनका सेवा काल अभी चार साल बाकी है. इनका एक ही बेटा है गौरव, जो प्रारंभ से ही पढ़ाई में बहुत अच्छे नंबरों से आगे बढ़ता रहा. यशोदानंदन चाहते थे कि बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा में आये, पर गौरव की अभिरुचि कम्प्यूटर साइंस में थी. पन्त नगर विश्वविद्यालय से एम.सी.ए. करके सीधे कैम्पस से चयनित होकर बंगलूरू में एक आइ.टी. कम्पनी में नौकरी पर लग गया. कम्पनी का पे-पेकेज बढ़िया है. नौसिखियों को भी २५-३० लाख रुपये सालाना मिलता है. वह संतुष्ट है.

यशोदानंदन जानते हैं कि अब जमाना बदल गया है. सब कुछ हाईटेक हो गया है. समय की रस्सी अब पुराने लोगों के हाथों से छूटती जा रही है, फिर भी पति-पत्नी की आस्थाएं अभी पुराने दौर से बाहर नहीं निकली हैं. चिलियानौला में उनका अपना स्वनिर्मित घर है. उन्होंने बरसों पहले सपने बुने थे, पर अब बेटे को आइ.टी. की नौकरी के चलते बड़े पँख लग गए हैं. तो वे सोचते हैं कि शायद ही अब इस घर में पारंपरिक पारिवारिक आनन्द-मेला लग पायेगा. ये सपनों का घर उन्होंने अपनी जवानी में बनवा लिया था. अभी भी बहुत खूबसूरत लगता है. वे कई बार पत्नी के सामने अपने दिल का दर्द बयान कर चुके हैं कि उनके बाद इस घर का क्या होगा. अम्बालिका पति से इस विषय में दार्शनिक न होने के लिए कहती है, "बेटे के साथ जायेंगे. जहाँ वह रहेगा, वहीं हम भी रहेंगे. इसमें भावुक होने की जरूरत नहीं है." पर मन तो दूर की सोचता है. यशोदानंदन कहने लगे, "बेटे-बेटियाँ तो दो चार होने चाहिए. कोई तो बुढ़ापे में अपने पास रहे और घर को भी संभाले." अम्बालिका ने बात काटते हुए कहा, “क्या आप खुद अपने पुश्तैनी गाँव में रह पाए? अब बेटे से ये उम्मीद करना कि हमारे पास ही अल्मोड़ा में रहे, कहाँ तक सही है? यहाँ उसके भविष्य के लिए क्या संभावनाएं हैं? आप खामख्वां परेशान हो रहे हैं." इस प्रकार की उधेड़बुन बुजुर्ग माता-पिता के मन में उभरना स्वाभाविक होता है. पर घड़ियों की सुइयां कभी भी प्रतिगामी नहीं होती हैं. जो कल था वह आज नहीं है और जो आज है वह आने वाले कल में नहीं होगा.

अम्बालिका का माँ का मन है, कल्पना किया करता है कि 'गौरव विवाह योग्य हो गया है... कोई कुलीन कुमाऊंनी बहू आयेगी... कम से कम स्नाकतोत्तर शिक्षा प्राप्त होगी. सासू नहीं, ‘ईजा’ के संबोधन से पुकारेगी. बेटे के साथ भी रहेगी तो भी साल में एक-दो बार हमारे सानिंध्य में रहने को अवश्य आयेगी. घर में दुगुना उजाला होगा.’ कभी ये भी सोचती है कि 'कोई संस्कारवान आई तो सुबह उठ कर प्रणाम करेगी. मेरे उठने से पहले ही पूजाघर साफ़ करके दिया-बाती एवँ आरती का थाल सजाकर आनंदानुभूति करायेगी. आगे जाकर पोता-पोती होंगे और घर गुलजार रहेगा’. पर ये सब एकाकी स्वगत बातें हैं.

गौरव दो साल तक तो विवाह के बारे में ना नुकर करता रहा क्योंकि उसे अपने कैरियर की ज्यादा चिंता थी. एक दिन माता-पिता की आशा के विपरीत उसने फोन से सूचित किया कि उसने जीवन साथी के रूप में एक लड़की जिसका नाम विभावरी जेठवा है पसंद की हुई है. उसने ये भी बताया कि “विभावरी को वह एक साल से ज्यादा समय से जानता है. विभावरी जर्मन एयरवेज, लुफ्थांसा, में एयर हॉस्टेस है. उसके माता पिता जाम नगर, गुजरात, में रहते हैं.” माँ द्वारा पूछने पर जब गौरव ने बताया कि वे लोग ब्राह्मण नहीं हैं, तो उसे बड़ा सदमा सा लगा क्योंकि अम्बालिका ने कभी भी अंतर्जातीय विवाह की कल्पना अपने बेटे के लिए नहीं की थी.

अब नई परिस्थितियों में दोनों जनों ने तुरन्त बंगलुरू जाने का कार्यक्रम बनाया ताकि घटनाक्रम को ठीक से समझा जा सके और अगर अनुचित लगे तो रोका भी जा सके. दिल्ली से उड़ान लेकर बंगलुरू बेटे के पास पहुँच गए. शंकित और उत्कंठित माता-पिता ने गौरव से विभावरी के बारे में बहुत से प्रश्न पूछ डाले. गौरव ने बड़ी बेबाकी से बताया कि विभावरी हफ्ते में दो बार बंगलुरू आती रहती है और इसी घर में उसके साथ रहती है. वे दोनों पिछले एक साल से लिव-इन रिलेशन में हैं.

माँ ने पूछा, “ये लिव-इन रिलेशन क्या होता है?”

बेटे ने बताया, “मम्मी, अब विवाह नाम की संस्था का महत्व धीरे धीरे कम हो रहा है. जरूरी नहीं कि ढोल-नगाड़े बजाये जाएँ और अग्नि के फेरे लगाए जाएँ. लिव-इन रिलेशन प्यार का रिश्ता होता है.”

पिता ने कहा, “ये बात हमारी समझ के परे है कि तुम शादी किये बगैर एक साथ रहो और सामाजिक मान्यताओं का मखौल उड़ाओ.”

गौरव बोला, “पापा, आप लोग बिलकुल परेशान न होएं, आजकल कई लोग इसी तरह रह रहे हैं. उनके बच्चे भी हैं. वे खुश भी रहते हैं. परम्परागत शादियां बहुत खर्चीली और दिखावा भर होती हैं.”

अम्बालिका बेटे का तर्क सुनकर रूआंसी हो गयी और विश्वास नहीं कर पा रही थी कि उसका बेटा ऐसा भी कह सकता है. गौरव ने माँ से कहा, “कल विभावरी आ रही है. आप लोग उससे मिलकर अपने सारे भ्रम दूर कर सकते हैं. इसमें इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है.”

अगले दिन अपने कार्यक्रम के अनुसार विभावरी आई. उसको शायद गौरव ने सारी वार्तालाप की जानकारी पहले दे दी थी. आते ही उसने दोनों के पाँव छू कर प्रणाम किया, अपने भारतीय होने का अहसास कराया. वह जीन्स में थी और अंग्रेजी मिश्रित टूटी-फूटी हिन्दी में उनसे बातें करने लगी. अम्बालिका को वह किसी भी कोण से अपनी बहू के फ्रेम में फिट नजर नहीं आ रही थी. अपने मन के गुबार निकालते हुए बोली, “बेटी, बाकी तो सब ठीक था, पर बिना ब्याह के किसी के शयन कक्ष में रहना अनाचार है. इसे हमारी संस्कृति स्वीकार नहीं कर सकती है.”

वातावरण बहुत गंभीर और बोझिल हो गया तो गौरव ने कहा, “अगर आप लोग वैदिक रीति से शादी को चाहते हैं तो हम वैसा कर लेंगे.”

विभावरी ने कहा, “एक और विकल्प है कि हम कोर्ट मैरेज कर सकते हैं क्योंकि रजिस्ट्रार का सर्टिफिकेट भी हमें भविष्य में चाहिए होगा.”

बहुत मन्थन, आपसी विचार विमर्श के बाद यशोदानंदन ने बेटे से कहा, “मैं एक बार विभावरी के पिता से इस विषय में बात करना चाहता हूँ.” फोन मिलाया गया. पहले विभावरी ने गुजराती में सारी भूमिका व परिचय कराया फिर यशोदानंदन ने मोबाइल पकड़ा. "हेलो, हेलो," के अलावा वे एक दूसरे की बात समझ नहीं सके क्योंकि दोनों तरफ भाषा एक समस्या रही.

अम्बालिका ने पति से कहा, “ऐसे कैसे चलेगी रिश्तेदारी? मेरी समझ में तो कुछ भी नहीं आ रहा है.”

अगले दिन विभावरी के जाने से पहले यशोदानंदन व अम्बालिका ने दोनों को साथ बिठाकर सब तरह से समझाया और अपना निर्णय बताया कि ‘वैदिक रीति से विवाहोत्सव तो अवश्य होगा और वह अल्मोड़ा में होगा. वधु पक्ष के लोगों के रहने ठहराने की उचित व्यवस्था की जायेगी.’

यशोदानन्दन पन्त पत्नी सहित अल्मोड़ा लौट आये हैं. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक शादी की तारीख तय नहीं हो पायी है. यद्यपि दोनों पक्ष इस रिश्तेदारी को सहमत हैं, पर अम्बालिका इस त्रासदी को अपनी मजबूरी मानती है.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी सीमाओं में सिमट जाना या जगत को अपनी सीमाओं में समेट लेना? यक्ष प्रश्न है यह।

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  2. सच्चाई को शब्दों में बखूबी उतारा है आपने . आभार . ये है मर्द की हकीकत आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  3. आज की नयी पीढ़ी के साथ साम्ञ्जस्य बैठाते माता पिता ॰

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  4. परम्परा और बदलाव (आधुनिकता बोध )का यह द्वंद्व हमेशा रहा है आइन्दा भी रहेगा .बच्चों को अपनी ज़िन्दगी जीने दें ,यदि उन्हें प्यार करते हैं तो अपनी झख छोड़ के जीवन को जिएँ .परिवर्तन शाश्वत है .सनातन है संस्कृति कोई रुका हुआ पानी नहीं है .वैदिक हो या पश्चिमी .

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