रविवार, 20 अक्तूबर 2013

ये सूखी झील सी आँखें

आँखें बहुत बड़ी नियामत होती हैं. इनके महत्व को वे ज्यादा अच्छी तरह महसूस करते हैं जो दृष्टिहीन होते हैं या दृष्टिहीन हो जाते हैं. यदि हम केवल दस मिनट तक ही दोनों आँखें पूरी तरह बन्द करके इस त्रासदी के बारे में सोचें/देखें जिसे दृष्टिहीन लोग जीवन भर भोगते हैं, तो भय लगता है.

कुछ लोग जन्मजात नेत्रहीन होते हैं और बहुत से लोग दुर्घटना या रोगग्रस्त होकर अपनी दृष्टि खो देते हैं. ये दुर्भाग्य अनादिकाल से इस धरती पर विद्यमान रहता आया है. अब जब मनुष्य जागरूक हुए हैं तो इसके निवारण के विषय बहुविध सोचने को बाध्य हुये हैं. ऐसा लगता है कि दृष्टिहीनता को कोई अभिशाप कहना भी उचित नहीं है. दृष्टिहीन लोगों की एक छठी इन्द्रिय अपने आप जागृत हो जाती है, जो वैकल्पित ज्ञान की संवेदनाएं प्रदान करने लगती हैं.

होमर, मिल्टन व सूरदास नैसर्गिक प्रतिभा के महान कवि हुए हैं. इसी तरह अनेक दृष्टिहीन संगीतकार व आध्यात्म के पण्डित भी हुए हैं, जिन्होंने अपनी कला व विद्वता से समाज को दिशा देने के प्रयास किये हैं.

सत्रहवीं शताब्दी में इटली के जेसूट फ्रांसिस्को ने नेत्रहीनों के लिए पढ़ने-लिखने की विधि निकालने की कोशिश की. बाद में फ्रांस के एक दृष्टिहीन व्यक्ति लुई ब्रेल (१८२१-१८५२) के पिता घोड़ों की जीन बनाने का काम करते थे. बालक लुई महज पाँच साल की उम्र में उसके साथ काम करते हुए या लकड़ी से खेलते हुए अपनी एक आँख को चोटिल कर गया. सही ईलाज नहीं मिलने से आँख में संक्रमण हो गया और वह खराब हो गयी. तीन साल के अन्दर धीरे धीरे दूसरी आँख की रोशनी भी चली गयी. बाद में लुई ब्रेल को एक अन्ध विद्यालय में पढ़ने पेरिस भेज दिया गया, जहाँ वह कालान्तर में सहायक अध्यापक भी रहा..

ब्रेल प्रतिभावान था. उसने दृष्टिहीनों के पढ़ने लिखने के लिए एक नई लिपि को जन्म दिया, जिसमें अँगुलियों के पोरों से अक्षरों के लिए कोड के रूप में उभार बिंदु बनाए गए हैं. आजकल हर भाषा उसी आधार पर अपने अल्फाबेट्स/ स्वर-व्यंजनों के कोड बन गए हैं. इस लिपि को ‘ब्रेल लिपि’ कहा जाता है. अन्ध विद्यालयों के बच्चे थोड़ा सा अभ्यास करके ब्रेल लिपि में पढ़ना लिखना बखूबी सीख लेते हैं. ब्रेल को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दी गयी है. भारत में सन २००९ में ब्रेल के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था.

कई नेत्रहीन व्यक्तियों को नेत्र प्रतिरोपण से भी दृष्टि प्राप्त हो जाती है. इसके लिए कई दृष्टिवान लोग मरणोपरांत अपने नेत्रदान करते हैं.

आज के इस वैज्ञानिक युग में इलैक्ट्रोनिक्स के बहुत चमत्कारिक प्रयोग किये जा रहे हैं. एडवांस मेडीकल साइंस में सेंसर लगी हुई इलैक्ट्रोनिक आँखों को दिमाग से जोड़ने का सद्प्रयास चल रहा है. वह दिन दूर नहीं जब नेत्रहीन व्यक्ति दृष्टिहीन नहीं रहेंगे.
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8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [21.10.2013]
    चर्चामंच 1405 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |

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  2. बढ़िया प्रस्तुति। जानकारी इतिहासिक और सामाजिक महत्व की मुहैया करवाई है आपने। आदमी दिमाग का अंधा नहीं होना चाहिए क्योंकि देखता दिमाग है आँख नहीं आँख तो एक उपकरण हैं दिमाग के मातहत काम करने वाला अलबत्ता उसकी सलामती जरूरी है। एक आँख हजार नियामत।

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  3. पहलीबार आपके ब्लॉग पर आया .... बड़ा ही सुंदर लेख लिखा आपने ... मेरे भी ब्लॉग पर आये

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  4. जिस दिन नेत्रहीन व्यक्ति दृष्टिहीन नहीं होंगे, वह दिन मानवता के लिए एक नए अध्याय का शुभारम्भ होगा।

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  5. प्रेरक व जानकारी से पूर्ण प्रस्तुति के लिय आभार

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  6. ब्रेल लिपि ने एक नया जीवन दिया है, नेत्रहीनों को।

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