गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

जिंदगी के साथ भी और...

भारतीय जीवन बीमा निगम का एक आकर्षक विज्ञापन है, ‘जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी’. बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के कार्य काल में सन १९६९ में हुआ था. इससे पहले बहुत सी बीमा कंपनिया देश में अपना कारोबार स्वतंत्र रूप से किया करती थी, पर उनकी इतनी विश्वसनीयता नहीं थी क्योंकि कई बार क्लेम्स के भुगतान के समय चूंकि, चुनांचे, या पर लगाकर कुन्नटबाजी होती थी, फिर भी प्रबुद्ध लोग अपने परिवारों को आर्थिक सुरक्षा-छत्र देने के लिए रिस्क कवर के नाम से जीवन बीमा कराते थे. इसे अनिवार्य बचत के रूप में भी मानते थे. यद्यपि बचत के रूप में जब रकम का गुणा-भाग किया जाता है तो ये बहुत घाटे का सौदा होता है. इसमें रूपये का अवमूल्यन बड़ा फैक्टर है. कहने को ये भी कहा जाता है कि बीमा में नियोजित राशि पर इनकम टैक्स में छूट मिलती है, पर ये नगण्य होती है. यदि कोई बीमित व्यक्ति असमय मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उसके आश्रितों को अवश्य करार के अनुसार पूरी रकम मिल जाती है.

सन १९६१ में नौकरी पर कनफर्म होते ही बीमा के एजेंट मेरे पीछे भी पड़ गए और पहला बीमा पाँच हजार रुपयों का तीस साल के लम्बे करार पर करा लिया. तब पाँच हजार रूपये आज के पचास हजार से ज्यादा मायने रखते थे. १५० रूपये वेतन में से १३ रूपये ४५ पैसे मासिक देना सहज नहीं लगता था, लेकिन जब गाड़ी चल पड़ी तो सैलरी सेविंग स्कीम के तहत यह रकम वेतन में से कट कर सीधे जमा होती होने लगी. उसके बाद के वर्षों में ज्यों ज्यों वेतन बढ़ा, मैंने फिर से तीन छोटी छोटी पॉलिसीस लेकर कुल १५ हजार का जीवन बीमा करा लिया. ये सभी पॉलिसीस सेलरी सेविंग स्कीम के तहत ही ली गयी. नई पॉलिसीस इस बात को ध्यान में रख कर ली कि बच्चों की पढ़ाई के वक्त काम आये.

सन १९७० में मेरा स्थानांतरण लाखेरी (राजस्थान) से कर्नाटक राज्य के शाहाबाद (गुलबर्गा) को हुआ, जहाँ मैं ठीक चार साल तक रहा फिर लौट कर वापस लाखेरी आ गया. शाहाबाद में भी मेरी चारों पॉलिसीस की किश्तें नियमित हर महीने वेतन में से कटती रही. बीमा सम्बन्धी खाते-कागजात भी राजस्थान के अजमेर डिविजन से हैदराबाद डिविजन में जाकर चार साल बाद वापस अजमेर आ गये. सब सामान्य चला. तीन छोटी पॉलिसियों के मैच्योर होने पर उनकी पूरी रकम बोनस सहित मुझे मिल भी गयी. लेकिन बाद में सन १९९० में जब ५००० रुपयों वाली पहली पॉलिसी मैच्योर हुई तो उसके पेमेंट में अडंगा लग गया कि सन १९७०से १९७४ के बीच जब मैं शाहाबाद रहा मेरी इस पॉलिसी की रकम खातों में नहीं दर्शाई गयी थी यानि जमा नहीं हुई बताई गयी.

सन १९९० तक जीवन बीमा निगम सागर से महासागर बन चुका था, लेकिन कार्यालय आज की तरह कम्प्यूटराइज्ड नहीं थे. हमारा क्षेत्रीय कार्यालय बूंदी आ गया था. बहुत लिखा पढ़ी करने के बावजूद भी मिसिंग किश्तों को नहीं जोड़ा जा सका. मैंने अपनी शाहाबाद वाली पे-स्लिप प्रमाणस्वरूप दी, पर निगम द्वारा उनका कन्फर्मेशन नहीं कराया जा सका क्योंकि तब तक शाहाबाद का हमारा कारखाना किसी अन्य पार्टी को बेचा जा चुका था.

जीवन बीमा निगम के स्थानीय डेवलपमेंट ऑफिसर स्वर्गीय त्रिवेदी ने आश्वासन दिया कि वे अजमेर कार्यालय से इसका सैटलमेंट करवा लेंगे, पर उसी बीच उनका स्थानातरण अन्यत्र हो गया. मामला टलता देख कर मैंने जीवन बीमा निगम के विरुद्ध जिला उपभोक्ता संरक्षण कमेटी को न्यायार्थ पेश कर दिया, लेकिन पूरे एक साल तक उस कमेटी की कोई मीटिंग नहीं हुई. इसी बीच बूंदी की जीवन बीमा निगम की शाखा प्रबंधक के रूप में मेरे एक परिचित-हितैषी व्यक्ति बाबूलाल पारेख (जो लाखेरी के ही रहने वाले हैं) आ गए. उन्होंने मेरे केस में अपनी रूचि दिखाई. मेरी मूल फ़ाइल ले ली और मुझसे उपभोक्ता संरक्षण से अपनी शिकायत वापस लेने को कहा तथा अटकी हुई राशि का भुगतान करने का पूर्ण आश्वासन दे दिया. तदनुसार मैंने केस वापस लेकर भुगतान के लिए इन्तजार किया, पर अफ़सोस तब हुआ जब केस की मेरी फ़ाइल कहीं गायब हो गयी. पुन: उपभोक्ता संरक्षण में वाद ज़िंदा करना चाहा, पर तब तक वह टाइमबार हो चुका था.

इस प्रकार मुझे अधूरे पेमेंट पर सन्तोष करना पड़ा. ये सारी कार्यवाही जीवन बीमा निगम के प्रति जिंदगी के साथ एक कड़वाहट मन में छोड़ गयी, जिंदगी के बाद की क्या बात की जाये?
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े भाई .. मैं भी भारतीय जीवन बीमा निगम का भुक्तभोगी हूँ .... रिस्क कवर के नाम पूरा बेवकूफ बनाते है.. आपका पैसा यु ही सोया रहता है..

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