गुरुवार, 12 जुलाई 2012

झूठ की कीमत

अब्दुल गनी टोंकवी अपने बचपन से ही बहुत मजाकिया और चुहुलबाज रहे हैं. राह चलते को छेड़ना व मसखरी करना उनकी फितरत रही है. वैसे ये सब खुदा की नेमत होती है, हर कोई आदमी खुशदिल नहीं होता है.

टोंक-सवाईमाधोपुर के बहुत से मुसलमान कारीगर होश सँभालते ही अहमदाबाद का रुख करते थे क्योंकि वहाँ कपड़ा मिलों मे खूब रोजगार मिलता था और पगार भी अच्छी मिलती थी. अब्दुल गनी टोंकवी के बड़े भाई नजीर अहमद बरसों से सपरिवार अहमदाबाद में रह रहे थे. रहने के लिए उन्होंने भी एक मुस्लिम बहुल इलाका ढूंढा था, जहाँ सामाजिक रूप से वे अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं, हालांकि उस इलाके में अपराध, गन्दगी तथा बीमारियाँ खूब फल फूल रही हैं. इन्ही बीमारियों के चलते वहाँ झोला-छाप डॉक्टर, वैद्य, या हकीम हर नुक्कड़ पर अपनी अपनी जाजम बिछा कर धन्धा करते हैं.

नजीर अहमद ने जब छोटे भाई को अहमदाबाद आने का बुलावा भेजा तो उसकी बाछें खिल गयी. तीसरे ही दिन वहाँ पहुँच गए. भाई ने कहा, “कुछ दिन घूमो फिरो, कुछ गुजराती बोलना सीखो, मिल मे भर्ती खुलते ही लगवा दूंगा.

अब्दुल गनी के लिए सारा वातावरण नया था. हिन्दी-उर्दू बोलने वालों को ढूंढना पड़ रहा था क्योंकि वहाँ गोल टोपी वाले और दाड़ी वाले मुसलमान भी फर्राटेदार गुजराती में संवाद कर रहे थे. भाई के घर से कुछ दूरी पर एक हकीम साहब का दवाखाना था. अब्दुल गनी डरते डरते उनके पास गए, अपना परिचय दिया, हकीम साहब बड़े अखलाख और महोब्बत वाले निकले. अब्दुल गनी को अपने पास आकर गप-शप करते रहने को कहने लगे. दरअसल बात यह भी थी कि उनके पेशे में नए नए मुहल्लों में ग्राहकी-सेंध लगानी होती है.

इस प्रकार गनी को हकीम साहब की दोस्ती रास आ गयी. उसके बोलचाल मे लतीफेबाजी व दिल्लगी हकीम साहब को भी भा गयी. यों अब्दुल गनी दिन भर हकीम साहब की बगल में बैठकर बतियाते रहता था. एक दिन एक मरीज आकर हकीम साहब से एक पुड़िया कब्ज दूर करने की दवा ले गया. बातों बातों मे अब्दुल गनी ने हकीम साहब से फरमाया कि “कब्ज तो मुझे भी रहती है, एक खुराक मुझे भी दे डालिए.” हकीम साहब ने एक पुड़िया दे दी. रात को सोते समय गरम पानी से लेने को कहा. हकीम साहब ने गनी से पैसा भी नहीं लिया, कहा, “अमा, तुम हमारे दोस्त हो गए हो और अभी तुम बेरोजगार भी हो.” अब्दुल गनी ने लंबा हाथ करके सलाम अर्ज करते हुए हकीम साहब को शुक्रिया कहा लेकिन रात को दवा लेना बिलकुल भूल गया. अगले दिन मिलते ही हकीम साहब ने पूछ लिया, ”मियाँ, कुछ कब्ज में फ़ायदा हुआ?”

गनी ने झूठ बोलते हुए कहा, “नहीं हकीम साहब, आपकी दवा से तो चिड़ियों को भी दस्त नहीं आएगा, ये बड़ी हल्की दवा आपने दी थी.” ये सुन कर हकीम साहब थोड़ा पशोपेश मे पड़ गए फिर बोले, “आज मैं दवा बदल कर देता हूँ.” इस प्रकार एक और असरदार दवा की पुड़िया उन्होंने अब्दुल गनी को दे दी. हुआ यों कि घर जाकर गनी ने अपने कपड़े घोने के लिए बदले तो पुड़िया जेब में ही रह गयी और धुल गयी.

फिर अगले दिन हकीम साहब से कैसे कहते कि ‘फायदा नहीं हुआ,’ लेकिन हकीम साहब ने पूछने पर कहना पड़ा, “अजी हकीम साहब, हम गुजराती नहीं हैं, जो पतली दाल गुड़ डाल कर खाते है. हम राजस्थानी हैं, अपना कोठा बहुत सख्त है. ऐसी वैसी दवा कोई असर नहीं करती है."

हकीम साहब को अपने इल्म और हुनर पर चोट लगती महसूस हुई. उन्होंने एक डबल डोज अपने सामने ही अब्दुल गनी को निगलवा दिया और दो गिलास पानी पिला दिया. थोड़ी देर बाद टोंकवी साहब घर चले गए. दवा वाली बात तो भूल ही गए. एक घन्टे बाद पेट मे कुछ हलचल हुई तो गुसलखाने मे घुसे और बहुत देर हो गयी बाहर नहीं निकले.

भाई व भाई का परिवार दस्तरखान पर खाना परोस कर इन्तजार करते रहे. जब काफी देर तक गुसलखाना नहीं खुला तो फ़िक्र हो गयी. ताक झाँक की गयी, आवाजें लगाई गईं पर कोई जवाब नहीं मिल रहा था. अनहोनी की आशंका होने पर दरवाजा तोड़ा गया तो पाया कि जनाब लैट्रिन में औंधेमुंह बेहोश पड़े हुए हैं. तुरन्त रिक्शा बुलाकर निकट के प्राइवेट अस्पताल पहुंचाया गया. जहाँ २४ घन्टे आई.सी.यू. में रखा गया, ग्लूकोज चढ़ाया गया. डाक्टरों ने फ़ूड पोईजनिंग का केस बताया. पुलिस थाने मे भी सूचना भेज दी गयी. पुलिस आई, पर बयानों से कुछ भी साबित नहीं कर पायी. अब्दुल गनी दो दिन और अस्पताल मे रहने के बाद घर आ गया. अस्पताल का बिल हजारों में बैठा, जो बड़े भाई ने इधर उधर से लेकर जमा कराया.

करीब एक हफ्ते बाद जब टोंकवी साहब घूमने फिरने लगे तो घूमते हुए हकीम साहब की तरफ चले गए. हकीम साहब ने जब उनकी पतली हालत देखी तो पूछा, “कहाँ रहे मियाँ, इतने दिन?”

अब्दुल गनी बोले, “क्या बताऊँ हकीम साहब, फ़ूड पोईजनिंग हो गयी थी. ऐसा दस्त हुआ कि २४ घन्टे में होश आया.” हकीम साहब सारा माजरा समझ गए. बोले, “मियाँ, ये फ़ूड पोईजनिंग नहीं थी, तुम्हारे झूठ बोलने की पोईजनिंग था. मेरी दवा से तुम्हारा सख्त कोठा ढीला हुआ है. आइन्दा दवा के मामले में झूठ मत बोलना. झूठ की भारी कीमत चुकानी पड़ जाती है.”
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