मंगलवार, 21 मई 2013

सावित्री मन्दिर

दुर्गालाल राजपूत के नाम में ‘सिंह’ नहीं जुड़ा क्योंकि वह एक दासी का बेटा था. उसका बाप बृजराज भी उसी की तरह पिछली पीढ़ी का ‘गोला-बाँदा’ था.

वह जब छोटा था तो उसे इन रिश्तों की कोई समझ नहीं थी और राजमहल की जनानी ड्योढ़ी की दासियों व उनके खैरख्वाह हिजडों की जो दुनिया उसने देखी थी, उसमें ‘दूध का रिश्ता’ केवल माँ तक ही सीमित रहा. बाकी बातें तो उसकी समझ में बहुत बाद में आई कि उसकी माँ रानी जी के साथ उनके दहेज के साथ उनके पीहर से आई थी. जिस तरह जनानी ड्योढ़ी की अन्य जवान दासियों की शादी की रस्में हुई उसी तरह उसकी माँ को भी एक दिन बृजराज के गले बाँध दिया गया था. ये कोई नई बात भी नहीं थी. सब राजा जी की मर्जी चलती थी.

अब तो राजपाट सब खत्म हो गए हैं. उसको याद है कि राजा जी के आदेश पर ही उसे  कम्पाउंडर की ट्रेनिंग के लिए इन्दौर भेजा गया था. तब वह भी यही सोचता था कि राजा जी तो सबके बाप होते हैं. जब बाहर की दुनिया में जाकर उसने खुला आसमान देखा और अन्दर की बातों का मनन किया तो उसे लगा कि वह गुलाम है. रही सही कसर एक ऐतिहासिक उपन्यास, आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा लिखित ‘गोली’ ने पूरी कर दी. इस उपन्यास में राजा-रानियों के अन्तरंग इतर प्रेम सम्बन्धों तथा हरम के अन्दर के दास-दासियों के किस्से वर्णित हैं. इस उपन्यास को वह एक साँस में आद्योपांत पढ़ गया और इसे पढ़ने के बाद उसके शंकालु मन में बहुत मैल उफन आया. उसे अपनी माँ से भी नफरत सी हो गयी. यद्यपि उसको ये जुमला याद था कि ‘माता कभी भी कुमाता नहीं होती है’ वह ये भी सोचता है कि उसका कसूर भी क्या था? वह ऐसे पिंजड़े में पैदा हुई थी, जिसमें पंछी के पर नहीं उगते थे.

उसको बृजराज पर बड़ा रहम आता था. वह उसे ‘बेचारा’ लगता था. वह तो गुलामों का भी गुलाम था. शायद उसके पुरुषत्व ने उसे कभी झकझोरा भी नहीं था. वह एक अनपढ़ चाकर की तरह राजा जी की खैरात पर पलता था.

एक स्थिति ऐसी आ गयी कि दुर्गालाल ज्यों ज्यों अपने बारे में सोचता जाता था, उसके मुँह में कसैला थूक जमा हो जाता था. उसका मन करता था कि परशुराम की तरह फरसा उठा कर तमाम राजपूत राजाओं का वंशनाश कर दिया जाय. कई बार वह अपने आप को ‘हरामी’ कह कर गाली भी दे लेता था.

वह रियासत द्वारा संचालित अस्पताल में काम करता था और पुराने किले के बाहरी हिस्से में बने सरकारी आवास में अकेला रहता था. उसके व्यवहार-बातों के कारण लोग उसे ‘अधपगला’ भी कहने लगे. उसकी मानसिक स्थिति सामान्य नहीं थी. इसी तुफैल में वह कुंवारा भी रह गया. उसकी बूढ़ी माँ हमेशा उसकी चिंता किया करती थी. उसकी ये हालत क्यों हो रही है वह कभी समझ नहीं पाई. उसने ‘जानकारों’ तथा ज्योतिषियों से टोटके भी करवाए, पर उसे तो झाड़-फूँक वाली बीमारी नहीं थी. वह प्रलाप किया करता था, और बिना नाम लिए ही अपशब्द-गालियाँ निकाला करता था.

दुर्गालाल की सोच के ठीक उलट राजा जी बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के विद्वान पुरुष थे. अपने राज्याभिषेक की स्वर्ण जयन्ती पर उन्होंने अपने दरबारियों एवँ निकट सम्बन्धियों को कई प्रकार के सम्मान व उपहार प्रदान करने के लिए भव्य समारोह आयोजित किया. इस समारोह में जब उन्होंने दुर्गालाल की माँ सावित्री को बहन व बृजराज को बहनोई के रूप में नवाजा तो प्रत्यक्षदर्शी दुर्गालाल के अन्दर सालने वाले सारे कांटे अचानक झड़ गए. उसके लिए ये एक बड़ा चमत्कार था. उसे अपनी विकृत मानसिकता पर बहुत अफसोस होने लगा. लोगों ने महसूस किया कि वह अब सामान्य हो गया है. सचमुच इस अधेड़ उम्र में जाकर उसके अंतर्द्वंद समाप्त हो गए. वह सभी धार्मिक अनुष्ठानों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा.

आज दुर्गालाल बहुत बूढ़ा हो चला है. उसके माता-पिता दोनों बरसों पहले इस दुनिया से जा चुके हैं. उसने अपनी माँ के नाम पर बस्ती से दूर एक टीले पर ‘सावित्री मन्दिर’ बनवाया है. नित्य क्षमा याचना करते हुए उसका स्मरण किया करता है. इस मन्दिर का इतिहास जाने बगैर ही सौभाग्यवती स्त्रियाँ पूजा अर्चना करके आशीर्वाद लिया करती हैं.

काषाय वस्त्र और कंठीमाला धारण किया हुआ दुर्गा बाबा हर आने जाने वाली महिला मे अपनी माँ का प्रतिरूप देखा करता है.
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4 टिप्‍पणियां:

  1. राजमहल में संबंधों की अजब स्थिति।

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  2. निचोड़,सच्‍चाई क्‍या रही। क्‍या राजा निश्‍चय ही दुर्गालाल की मां जैसी दासियों को बहन मानता था, क्‍या चतुरसेन शास्‍त्री द्वारा रचित गोली उपन्‍यास में असत्‍य बातें थीं, क्‍या दुर्गालाल का उसको विक्षिप्‍त बनाने का पूर्व अन्‍दरद्ंवद आधारहीन था। या उसका बाबा बन कर महिलाओं के प्रति उपजा नव सद्विचार सही था।,,,,,,,,,,,,,,,,,,ऐसे प्रश्‍नों को तो यह अत्‍यन्‍त विचारशील कहानी अर्द्धराह में छोड़ गई।

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    1. १.बडोला जी नमस्कार, आपकी टिप्पणी मैंने आज ही पढी, दरसल ये एक घटनाओं पर आधारित किसी व्यति विशेष की मन:स्थिति दर्शाने वाली कहानी मात्र है. जहां तक संबंधों की बात है exceptions are always there.

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  3. सीधी बात अन्तोगत्वा भ्रम एवं शंका दुर्गालाल का टुटा.

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