सोमवार, 6 मई 2013

कोटगाड़ी मन्दिर

महाकवि कालिदास की कथा में इस बात का विवरण है कि वे विवाह से पहले बुद्धू थे और राजपुत्री विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में हारे हुए विद्वानों ने चालबाजी से विद्योत्तमा का विवाह कालिदास से करवा दिया. शास्त्रार्थ मौन होना था. केवल इशारों से ही प्रश्न व उत्तर दिये जाने थे इसलिए विद्योत्तमा ने जब ‘ईश्वर एक है?’ के प्रश्न को एक अंगुली उठाकर पूछा तो कालिदास कुछ और ही समझ बैठे, और उन्होंने दो अंगुलियां उठाकर प्रत्युत्तर दिया; फिर क्या था? सभी पंडितों ने उनके समर्थान में तालियाँ बजा दी कि ‘ईश्वर के दो रूप होते हैं- एक ‘देव’ तथा दूसरी ‘देवी’.

सनातनी विश्वासों में ‘देवी’ के अनेक रूप व असंख्य नाम हैं, जिनको लोग श्रद्धा के साथ ध्याते हैं, पूजा अर्चना करते हैं. अनेक मन्त्र व सिद्धियाँ हैं, जिनसे लोगों का मानना है कि देवी प्रसन्न होती हैं.

हमारे ‘देवभूमि’ कहलाने वाले उत्तराखंड में एक विशिष्ट ‘कोकिला माता का मंदिर’ पिथौरागढ़ जिले की उपत्तिकाओं में स्थित है, जो ‘कोटगाड़ी’ के नाम से प्रसिद्ध है. यह स्थान थल से १२ किलोमीटर दूर है. बागेश्वर से धरमघर जाते हुए कांडा-कमेड़ीदेवी-पांखू से आगे पड़ता है. पेड़ों की झुरमुट में बना हुआ यह सुन्दर प्राचीन मंदिर सैकड़ों छोटे-बड़े घंटे-घण्टियों से सुसज्जित है. कहते है कि यहाँ कभी चोरी नहीं होती है.

कोकिला माता न्याय की देवी मानी जाती हैं. उनकी विशेषता यह है कि फरियादी अगर सच्चा है तो उसकी न्याय पाने की गुहार पर देवी माँ तुरन्त फैसला ले लेती है. अन्यायी को अवश्य प्राकृतिक रूप से दण्डित कर देती है. जिन असहाय लोगों लोगों के पास अदालती सबूत व गवाह अथवा खर्चा नहीं होता है, वे देवी की शरण में आकर मौखिक या लिखित अपनी बात पेश करते हैं.इस मंदिर की देवी के प्रताप की महिमा पूरे कुमाऊं प्रखंड में विश्वसनीयता के साथ मानी जाती है. इसलिए कोटगाड़ी का नाम लेते ही अन्यायी पक्ष भयभीत हो जाता है.

आज के इस वैज्ञानिक युग में जब मनुष्य चाँद-तारों व अन्य ग्रहों में जीवन की खोज कर रहा है, तो यह सब अविश्वसनीय सा लगता है, पर यह सच है कि इस मंदिर की देवी की महिमा लोगों की आस्थाओं पर खरी उतरती है. सैकड़ों उदाहरण लोगों के मुख से सुने जाते हैं कि कोकिला माता ने उनको न्याय दिलाया है.

मजेदार बात है कि पीड़ित पक्ष अन्यायी को सीधे सीधे चेतावनी देता है कि ‘वह कोटगाड़ी जाकर ‘घात’ डालेगा. सामने वाला उस बात की गंभीरता को समझता है. यह एक नैतिक नियम सा लगता है.

कोटगाड़ी मंदिर में वहीं के मदीगाँव के ग्रामवासी बारी बारी से पुजारी का काम करते आ रहे हैं. पिछले कुछ दशकों में जब सारे पहाड़ से अनेक कारणों से लोगों का पलायन हो गया है तो इसकी बयार वहाँ भी बहने लगी. रोजगार या बेहतर जीवन शैली की तलाश में काश्तकार तराई-भाबर में आ बसे हैं. नैनीताल और उधमसिंह नगर में लालकुआँ रेलवे स्टेशन से पंतनगर तक पूर्व में गौला नदी के पाट पर बिन्दुखत्ता एक बहुत बड़ा उपजाऊ क्षेत्र है. पहले यह एक बीहड़ जंगल होता था. पहाड़ से आकर पूरे इलाके में अब कब्जा करके लोग बस गए. पहले तो जंगलात विभाग वाले इन बाशिंदों को बहुत तंग करते थे, कानूनी कार्यवाही भी करते थे, पर अब उत्तराखंड की सरकार ने इनको वैधानिक दर्जा देते हुए नियमित करने की प्रक्रिया जारी की हुयी है. यद्यपि अभी भी बहुत सी नागरिक सुविधाओं की कमी है, पर वोट बैंक बड़ा होने के कारण लोगों को भविष्य में अच्छी उम्मीदें हैं. जिन लोगों ने जंगल काटकर खेत बनाए (यहाँ जंगली जानवर सांप- मच्छरों का आतंक था, और कहते हैं कि चोर उचक्के भी बहुत थे), अब उनके या उनके वंशजों के पक्के घर हैं. वे समृद्ध हैं, ट्यूब वेल, ट्रैक्टर, डिश-टी.वी., ट्रक, ये सब इसके सबूत के तौर पर साफ़ नजर आते हैं.

मुझे हाल में एक बारात में सम्मिलित होकर इस इलाके को देखने का अवसर मिला, तो देखा वहाँ एक छोटा सा लाल रंग का सुन्दर मंदिर बना है. शांतिपुरी( नम्बर दो ) के पीछे वाले बिन्दुखत्ता क्षेत्र में यह स्थित है. पूछने पर पता चला कि ये कोटगाड़ी (कोकिला देवी) का मंदिर है. एक पुजारी पहाड़ के गाँव से यहाँ आकर बस गया है, उसने ही इलाके वालों के सहयोग से इसकी स्थापना की है. इस स्थान की मान्यता भी वैसी ही बताई गयी है जैसी कि मूल कोटगाड़ी (पिथौरागढ़) की है. यह भी पता चला कि यहाँ का पुजारी अपनी बारी आने पर पहाड़ भी जाता है.

कलिकाल के ऐसे समय में जब हमारे पूरे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार व अनाचार उजागर हैं, तो लगता है कि लोगों को देवी-देवताओं का बिल्कुल भय नहीं रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में कोटगाड़ी (कोकिला मईया) का अक्षुण्य प्रभाव है वह स्वयम्भू है और अन्यायी को दण्ड देने में देर नहीं करती है.

 आस्थावान लोग मानते हैं कि ईश्वर का भय बना रहने से समाज में सदाचार कायम रहता है.

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8 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत अच्‍छा सामयिक विषय प्रस्‍तुत किया है। आस्‍थावान लोगों का अभिनन्‍दन है। पर परिस्थितियों से जूझते हुए मैं प्रतिदिन ईश्‍वर के प्रति आस्‍था व अनास्‍था में झूल रहा हूँ। अब आज ही देख लें मैं नास्तिक बना हुआ हूँ। कारण बहुत से हैं। टिप्‍पणी में उन्‍हें प्रस्‍तुत करना ठीक नहीं है। आशा है मैं पीड़ित भी कभी कोटगाड़ी मन्दिर में प्रार्थना करुंगा कि मुझे सतानेवालों को दण्‍ड दे।

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  2. बहुत सुंदर
    अच्छी जानकारी
    संग्रहणीय लेख

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार ७/५ १३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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  4. कोकिला देवी के प्रति आस्था की जानकारी के लिये
    धन्यवाद.
    आज जीवन के प्रति लोगो की आस्था मिट रही है
    तभी तो भागमभाग मची हुई है---और--और--और
    पत्थरों में बसी आस्था को कौन देखे

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  5. purane samay mai paharon mai iss tarh ki dharnda thee tajub hai tarae mai iss samay bhe yaise dharana chal rhe hai?

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  6. यह भी पढ़ें:
    सच्चा न्याय दिलाने वाली माता कोटगाड़ी: जहां कालिया नाग को भी मिला था अभयदान
    कोकिला देवी माता ‘कोट” यानी कोर्ट में उद्घाटित न हो पाए न्याय को भी बाहर ‘गाड़” यानी निकाल देती हैं।
    दिव्य अनुभवों से परिपूर्ण है यह नाग भूमि
    शिखर-भनार व सनगाड़ के देव मंदिर भी हैं अटूट आस्था के केंद्र
    भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, कोटगाड़ी ने भी किया पलायन @ नवीन जोशी समग्र @ http://navinjoshi.in/2014/10/16/kotgadi/

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