शुक्रवार, 17 मई 2013

जीवन-प्रवाह

तब फूलों के
कलियों के
सपने आते थे,
झरने बहते थे,
हवा मे अठखेलियाँ हुआ करती थी,
मन का पंछी-
बिना गुदगुदाए मुस्काता था,
हंसता रहता था.
दूर क्षितिज के उस पार-
किसी  से तार जुड़े थे
अपनेपन के रिश्ते;
जिनकी मुझे प्रतीक्षा रहती थी .

फिर उजास, स्वर्णिम आभा में
तृण-बेल-लता-बृक्ष
रसीले, मधुर फलोच्छादित
कल्लोल करते चराचर और मैं,
अचानक पटाक्षेप .

अब सपनों में
पीला रेगिस्तान खुला है,
कैक्टसों की छाया है,
तपन है,
आँधी सी है,
जो कश्ती को बिना प्रयास खींचे जाती है
बड़े अगाध सागर की लहरों में –
लयबद्ध हिचकोले हैं,
ऐसा लगता है
दूर क्षितिज के उस पार-
एक ‘बड़ी रोशनी’ से तार जुड़े हैं
जो मेरी प्रतीक्षा में है.

यही है जीवन का सच
एक कहानी अनवरत,
पूरा पहिया घूम रहा है
उस ‘नेति’ शक्ति के इर्द.
          ***

8 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य नेति से व्यक्त होता, बिछोह की पीड़ा पर मरहम लगाता दर्शन।

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(18-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  3. शिशु मानव से ले कर अब तक का अपना क्‍या जीवन दर्शन व्‍यक्‍त किया है कविता के माध्‍यम से! स्थिर करनेवाला अनुभव।

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  4. जीवन दर्शन को गहराई से रेखांकित करती कविता ......
    बहुत बढ़िया .....

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  5. ये जीवन है
    सुन्दर रचना

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार!

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