सोमवार, 1 अप्रैल 2013

फूल सिंह 'मुक्का'

ये नामकरण करने वाले पण्डित भी अजीब किस्म के होते हैं. गेंदा सिंह के फूल से बच्चे का नाम फूल सिंह रख दिया. ये फूल हिन्दी वाला है या अंग्रेजी वाला तब इस बात पर गौर करने की जरूरत नहीं समझी गयी. जब बच्चा बड़ा हो गया और कुछ तुकबंदी-कवितायें गढ़ने लगा तो उसने अपना उपनाम ‘मुक्का’ रख लिया. हिन्दी- उर्दू में हुक्का, हुल्लड़, कुल्हड़ जैसे बेढब उपनामों की देखा देखी, फूल सिंह ने ‘मुक्का’ बनना ठीक समझा. वैसे भी बचपन से उसे बात बात में गुस्सा आने पर मुक्का शब्द के प्रयोग करने की आदत सी हो गयी थी. जैसे कि, “दे मुक्का”, “दूंगा एक मुक्का”, या ज्यादा ही ताव आने पर कहता था, “दूँ साले को एक मुक्का.” यों ये रफत भी था कि अब तो फूल सिंह मुक्का आम लोगों में एक चर्चित नाम हो गया है.

जब मुक्का साहब पढ़ लिख कर अध्यापक बन गए और उनकी शादी हो गयी तो लोगों की जुबान पर एक नया शब्द आ गया ‘मुक्की”. यूं मुक्का-मुक्की मजे से रह रहे थे. मुक्का जी की एक विशेषता यह भी रही कि वे हमेशा नियानब्बे के चक्कर में रहते हैं. चमड़ी जाये पर दमड़ी ना जाये के सिद्धांत पर चलते हैं. ये बात उनके विद्यार्थियों से लेकर चोर-उचक्कों तक सबको मालूम है.

पिछले साल ३१ मार्च को शहर के कुछ शौक़ीन लोगों ने सोनी टी.वी. के कुछ कलाकारों को बुलाकर ‘कॉमेडी नाईट’ का आयोजन करा डाला. पर्चों तथा लाउड-स्पीकरों से जमकर प्रचार किया गया . इसमें न्यूनतम टिकट की कीमत दो सौ रूपये का प्रावधान था. मुक्की का बड़ा मन था कि इस आयोजन का आनन्द लिया जाये, पर चार सौ रुपयों का दंड कौन सहे? घर में धक्का-मुक्की तो नहीं हुई लेकिन मुक्का जी ने ‘ना’ कह कर पत्नी को निराश कर दिया.

होनहार देखिये, डाक से लिफ़ाफ़े में उसी आयोजन के सुपर क्लास के यानि पाँच सौ रुपयों वाली दो टिकट घर पर ही आ गई. किसने भेजी? कौन था मेहरबान? बहुत सोचा, पर कोई कयास नहीं लग सका. मुक्का जी अपनी पत्नी से बोले, “ये सब ऊपर वाले की करामात है, छप्पर फाड़ के टिकट भेजे हैं. तुम तो दो सौ वाले टिकट ही चाहती थी. उसने पाँच सौ वाले भेज दिये.” मुक्की खुश हो गयी. उसको मन की मुराद मिल गयी थी. मुक्का जी को टिकटों के नकली होने का संदेह हुआ और वे इसकी पड़ताल करने आयोजकों के कार्यालय गए. मालूम हुआ कि टिकटों में कोई खोट नहीं था. वे सही थे. फिर क्या था, नियत ३१ तारीख की शाम को दोनों जने घर को ताला जड़ कर चल पड़े. रात भर हँसी के फव्वारों में नहाते रहे. सुबह चार बजे हँसते-हँसाते घर लौटे तो घर के ताले खोलने की जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि ताले टूटे हुए थे और घर का सारा कीमती सामान गायब था.

सीधे पुलिस स्टेशन का रुख किया और घटना की एफ.आई.आर. लिखवाई. इन्स्पेक्टर ने नाम पूछा तो उन्होंने कहा “फूल सिंह मुक्का” इन्स्पेक्टर मुस्कुराते हुए उनके चहरे की गहराई सी नापने लगा और बोला “आपको आज की तारीख भी याद होगी, आज एक अप्रेल है, क्या कॉमेडी है.”

इस सारे संयोग पर सोचने पर मुक्का जी को ‘फूल’ बनने पर शर्मिंदा होने के साथ साथ, ‘लुट जाने’ का गहरा धक्का भी लगा.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. अप्रैल फूल मनाया, मुक्‍का जी को गुस्‍सा आया।

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  2. व्यंग्य विनोद का झरना बहा दिया मुक्का मुक्की फूल फुल्निया ने .शुक्रिया आपके उत्साह वर्द्धक टिप्पणियों का .

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