गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

बैठे ठाले - ३

आजादी के बाद जो प्रांतीय या राष्ट्रीय नेता उभर कर सामने आये उनकी स्वच्छ छवि अभी भी हम पुरानी पीढ़ी के लोगों के जहन में मौजूद है. उनका उज्जवल सार्वजनिक जीवन था. आजादी की लड़ाई में सोने की तरह तप कर निखरे थे. उन पर हम भरोसा करते थे. अपनी बात आसानी से उन तक पहुँचा सकते थे. ये सुरक्षा का तामझाम भी तब नहीं होता था. अब तो छुटभय्ये नेताओं के साथ तक बन्दूक धारी सुरक्षाकर्मी चलते हैं. सचमुच नेता शब्द की परिभाषा ही बदल गयी है.

उत्तर प्रदेश में सर्व श्री गोविन्दबल्लभ पन्त, सुचेता कृपलानी, चंद्रभान गुप्ता, राजस्थान में मोहनलाल सुखाड़िया, मध्य प्रदेश में रविशंकर शुक्ला और उनके पुत्र, बिहार में श्रीकृष्ण सिन्हा, प.बंगाल में बिधानचंद्र राय, तमिलनाडू में कामराज नाडार, महाराष्ट्र में यशवंतराव चह्वाण, वसंतराव नायक, गुजरात में बलवंतराय मेहता व हितेंद्र देसाई इसी तरह पंजाब, मैसूर (कर्नाटक) आंध्रा व केरल तथा अन्य राज्यों में निर्विवाद नेता थे, जिनकी लिस्ट बहुत लम्बी है. ये सभी सर्वमान्य आदरणीय राष्ट्र नायक थे. इनका दबदबा भी था.

तब इतने राजनैतिक दल भी नहीं थे. इन दलों की बाढ़ तो कुकुर्मुत्तों की तरह बहुत बाद में आई. तभी नेतागिरी का अवमूल्यन भी शुरू हुआ.

पुराने नेताओं का चाल चरित्र ऐसा होता था कि अपने आप श्रद्धाभाव पैदा हो जाती थी. प्रशासन में उनके नाम की धाक होती थी. केवल नेता ही नहीं, तब प्रशासनिक अधिकारियों में भी गजेटेड ऑफिसर का मतलब ईमानदारी का ठप्पा होता था.

आज नेतागिरी व्यापार हो गयी है और पूरा तन्त्र भ्रष्ट हो गया है. कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन इस सच्चाई को नहीं नकारा जा सकता है कि पूरे कुँएं में भांग पड़ी है. सभी नेता एक दूसरे को चोर साबित करने में जुटे रहते हैं.

साठ के दशक में रानीखेत के नन्दाबल्लभ मठपाल को अपने भाई गोविन्दबल्लभ मठपाल को ईलाज के लिए लखनऊ ले जाना पड़ा, तब रानीखेत या नैनीताल में सुविधा संपन्न अस्पताल व विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी रही होगी. वे पाँच सौ रूपये साथ में लेकर गए थे, पर वहाँ खर्चा आठ सौ के आस पास आ गया. उन दिनों पैसे भेजने का जरिया मनीआर्डर होता था, अस्तु उन्होंने अपने घर तार देकर तुरन्त तार मनीआर्डर से तीन सौ रूपये और मंगवाए. तीसरे दिन तार मनीआर्डर आ गया. लखनऊ चौक वाले पोस्ट ऑफिस के पोस्टमास्टर के मार्फ़त (केयर आफ) मंगवाए गए थे. पोस्ट मास्टर ने कहा, “जामिन (जमानतदार) ले आओ, रूपये लेकर जाओ.” नन्दाबल्लभ मठपाल ने बताया कि उनको उस शहर में कोई नहीं पहचानता है तो पोस्ट मास्टर ने कहा कोई पहचान वाला तो लाना ही पड़ेगा.” नन्दाबल्लभ ने पोस्टमास्टर को बताया कि “एक आदमी है जिसे मैं अच्छी तरह से जानता हूँ, पर वह मुझे नहीं जानते हैं.” पोस्टमास्टर ने विस्मित होकर पूछा, “कौन है वह?” नन्दाबल्लभ मठपाल ने कहा, “हमारा एम.एल.ए., चन्द्रभान गुप्ता, जो आजकल मुख्य मन्त्री हैं.”

इतना सुनते ही पोस्टमास्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, “इतने बड़े आदमी से सम्बन्ध है और पहचान को तरस रहे हो? आप रूपये ले जाओ, जमानतदार की जगह उनका नाम लिख दो.”

ऐसा होता था. नेताओं के नाम पर लोगों का भरोसा होता था. आज सिर्फ पचास सालों में हम कितने नीचे चले गए हैं. सुधार की गुंजाइश कम ही नजर आ रही है. अन्ना हजारे जी ने एक जन आन्दोलन शुरू किया था. लोगों को बहुत बड़े परिवर्तन की उम्मीद जग रही थी, लेकिन वह एक अधूरा सपना सा साबित होकर टूट गया है, पर इन्कलाब तो चाहिए ही.
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9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. क्या थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी...

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    1. हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी
      आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी
      आए नहीं थे स्वप्न में भी जो किसी के ध्यान में
      वे प्रश्न पहले हल हुवे थे एक हिन्दुस्तान में
      अनुकुल अवसर पर दयामय फिर दया दिखलाएंगे
      वो दिन यहाँ फिर आयेंगे, फिर आयेंगे, फिर आयेंगे
      ----- ।। मैथिली शरण गुप्त ।। -----

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  3. बहुत ही बढ़िया उद्धरण प्रस्‍तुत किया है आपने पूर्व के सज्‍जन नेता के नाम पर पोस्‍टमास्‍टर का नन्‍दाबल्‍लभ मठपाल को मनीआर्डर के पैसे देने का। निश्‍चय ही ६० वर्ष पूर्व जीवन, संस्‍कार क्‍या थे और अब क्‍या हो गए हैं।

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  4. बहुत खूब वे लोग स्टेट मैन्स थे आज धन्धेबाज़ हैं .दल्ले हैं .माफिया हैं .

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  5. सचमुच नेता शब्द का मतलब ही बदल गया है----

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  6. क्या बात है | बेहतरीन | अत्यंत सुन्दर प्रस्तुति | राम नवमी और नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत् 2067, युगाब्द 5112,शक संवत् 1932 तदनुसार 16 मार्च 2010 , धरती मां की 1955885111 वीं वर्षगांठ तथा इसी दिन सृष्टि का शुभारंभ, भगवान राम का राज्याभिषेक, युधिष्ठिर संवत की शुरुवात, विक्रमादित्य का दिग्विजय, वासंतिक की हार्दिक शुभकामनायें |

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