गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

चित्तवृति

पाप-पुण्य से परे
 अप्रभाषित-
  और अपरिमित,
   विकारी भी है
    ये चित्तवृति  है.

अदृश्य अनाहत सी
 अठखेलियां करती है
  किसी को सन्मार्ग –
   किसी को भटकाती है
    ये चित्तवृति है.

ये मन की चितवन है
 बहुत चँचल है
  कोई भूल नहीं-
   चाहे लगे नहीं अनुकूल कभी,
    ये चित्तवृति है.

जीवन को गति मिलती है
 तन-मन में स्पंदन से
  चाहे-अनचाहे भी
   स्पंदन देती है
    ये चित्तवृति है.

ये तो सुरताल-
 बिना बजाये जो बजती है
  ये राग नि:शब्द-
   यदाकदा जो छा जाती है.
    ये चित्तवृति है.
           ***

8 टिप्‍पणियां:

  1. चाहे-अनचाहे भी
    स्पंदन देती है
    ये चित्तवृति है...........किवाड़ के भीतरी किवाड़ को खोल दिया आपने।

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  2. ये तो सुरताल-
    बिना बजाये जो बजती है
    ये राग नि:शब्द-
    यदाकदा जो छा जाती है.
    ये चित्तवृति है.

    काश ये चित्त वृत्ति एकाग्र और निरुद्ध भी बने .

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  3. जीवन को गति मिलती है
    तन-मन में स्पंदन से
    चाहे-अनचाहे भी
    स्पंदन देती है
    ये चित्तवृति है.

    सही कहा आपने आदरणीय पुरुषोत्तम पाण्डेय सर। बहुत-बहुत बधाई। मेरे ब्लॉगपर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  4. yeh raag ni shabd...wah sir ati sundar.....even i write i would appreciate if you can see my blog too www.thinkndshare.blogspot.com hindi poems

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