शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

घर-जमाई

किसी विद्वान ने लिखा है कि ‘इतिहास खुद को दुहराया करता है और अगली बार उसी पर प्रहसन यानि नाटक भी करवाता है'.
 मैं, टीकाराम फुलारा अपने देश से बहुत दूर स्विट्जरलैण्ड के ज्यूरिख शहर में एक आलीशान घर में अपनी पत्नी के साथ बैठा हूँ. दूसरी ही दुनिया के अति रमणीय, मनमोहक अवर्णनीय नजारों में खोया हुआ हूँ. हमारे बेटे भास्कर ने मुझे और अपनी माँ को बहुत आग्रह करके यहाँ बुलाया है. उसी ने पासपोर्ट, वीजा, सब कागजी कार्यवाही की है, वरना मेरी क्या औकात या विसात थी कि हवाई यात्रा करके यूरोप के इस सुरम्य-सुन्दर देश जिसे धरती का स्वर्ग भी कहा जाता है, में पहुँच सकता.

स्वर्ग और नरक की बहुत सी कथा-कल्पनाएँ मैंने पढ़ी सुनी हैं पर ये ‘लोक’ इस पृथ्वी के बाहर कहीं नहीं हैं. विज्ञान ने इन कपोल कल्पनाओं की असलियत खोल दी है. अंतरिक्ष में दूर दूर तक खोजबीन हो चुकी है इसलिए ये शाश्वत सत्य उजागर हो चुका है कि जहाँ सुख है, वहीं स्वर्ग है, और जहाँ दुःख है, वहीं नरक है. कथाओं के सूत्र तो आम लोगों को सद्मार्ग पर बाँधे रखने के लिए रचे गए हैं.

यद्यपि सुख-सुविधाओं और ऐश्वर्य के मामलों में मेरा देश भारत इस विकसित देश से १०० वर्ष पीछे होगा, पर मेरे संस्कारों में गहरा जड़ा हुआ है ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ इसलिए मैं हजार गरीबी, बीमारियों, अभावों, अनाचार-अत्याचारों व गन्दगी आदि नकारात्मक परिस्थितियों के होते हुए भी ‘मेरा भारत महान’ ही कहना चाहूँगा.क्योंकि वहाँ मेरा अपनापन है.

मेरा बचपन बहुत अभावों में बीता. मेरे पिता स्व. मोतीराम फुलारा मेरे नाना-नानी के घर जमाई बने क्योंकि मेरी माँ के अलावा नाना-नानी की कोई और औलाद नहीं थी. नाना जी का गांव बाड़ीखेत, कौसानी से लगभग २५ किलोकीटर दूर उत्तरमुखी पहाड़ी पर है, जहाँ से उत्तुंग विशाल हिमालय की त्रिशूल व पंचचूली बिलकुल सामने उज्जवल-धवल, मुकुट-मणि की तरह नजर आते हैं. बचपन में तो मुझे उस नैसर्गिक सौंदर्य का कोई अहसास नहीं होता था क्योंकि जब से होश संभाला, ये नजारा नित्य ही देखता था. यहाँ स्विट्जरलैण्ड में आकर मुझे बार बार उस दृश्य को याद करने का मन हो रहा है, और मैं आँखें बन्द करके उसे अप्रत्यक्ष रूप में देख लेता हूँ और आनंदित होता हूँ. बाड़ीखेत गाँव के चारों ओर चीड़ के घने जंगल हैं. बीच में ये गाँव एक नखलिस्तान की तरह जैसे तराशा गया है. इसमें तब मात्र १२ घर थे. सब खेतीहर गरीब लोग थे. आज के तराजू से तौलेंगे तो सभी बीपीएल थे. मेरे पिता भी पैदाइशी गरीब थे तभी तो अपने गाँव डफौट से यहाँ ससुराल में रहने आ गए. चूंकि बाड़ीखेत गाँव में अब तक मेरे पिता ही पहले व आख़िरी घरजमाई बने थे इसलिए गाँव के सभी लोग मेरे परिवार को नाम या जाति से न पुकारते हुए केवल घरजमाई ही कहा करते थे, यानि एक तरह से हमारा उपनाम घरजमाई हो गया, जो असहज भी नहीं लगता है क्योंकि बचपन से ही इस संबोधन को सुनते आये हैं.

बाड़ीखेत से खड़ी पहाड़ी की पगडंडी द्वारा ५ किलोमीटर नीचे उतर कर गरुड़ बाजार है. वहीं स्कूल होता था. मैं रोज नगेपाँव इतनी दूर पढ़ने जाता था. आठवीं कक्षा तक पढ़ पाया. बाकी समय अन्य लड़के-लड़कियों के साथ जंगल में गाय, भैंस व बकरियां चराया करता था या बन्दर भगाया करता था क्योंकि फसलों को बंदरों से बचाना जरूरी होता था.

सयाना होने पर मैं एक रिश्तेदार के साथ बरेली आ गया,  और माचिस फैक्ट्री में मजदूरी करने लगा. कुछ सालों के बाद मेरा विवाह पर्कोटी गाँव की हेमंती देवी से हुआ. विवाह के दो वर्षों के अंतराल में हमको एक पुत्ररत्न की प्राप्ति भी हो गयी. जिसका नाम रखा गया भास्कर. भास्कर के सात साल के होने पर मैं उसे अपने साथ बरेली ले आया. उसे स्कूली शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल में भर्ती करा दिया. ये भगवत कृपा थी भास्कर पढ़ने में होशियार निकला. उसकी बुद्धि चातुर्य देखकर स्कूल के प्रधानाध्यापक ने एक बार कहा था, “बुद्धि किसी की बपौती नहीं होती है. भास्कर एक दिन तुम्हारा नाम अवश्य रौशन करेगा.”

हम दोनों बाप-बेटे जब भी छुट्टियाँ होती, गाँव हो आते थे, पर जब मेरे माता-पिता थोड़े अंतराल में स्वर्ग सिधार गए तो घर की सारी जिम्मेदारी चचेरे मामा लोगों को देकर भास्कर की माँ को भी बरेली ले आये. तब भास्कर दसवीं में पढ़ रहा था.

मेरी फैक्ट्री के मालिक को जब भास्कर के हाईस्कूल की बोर्ड  परीक्षा में प्रथम आने की खबर हुई तो उन्होंने मुझे बुलाकर कहा, “तुम्हारे बेटे को आगे मैं पढ़ाऊंगा.” उनकी यह मेहरबानी भरी वाणी सुन कर मेरी अश्रुधारा बह निकली क्योंकि मैं अपने खर्चे से उसे आगे पढ़ाने में असमर्थ था.

नास्तिक लोग कहते हैं कि "ईश्वर कहीं नहीं है, ये जो होता है प्रकृति स्वयं करती है." लेकिन नहीं, कोई ऐसी अदृश्य शक्ति जरूर है जो इस सारी व्यवस्था को चला रही है अन्यथा ये सारे तारतम्य जिनको संयोग कहते हैं, कैसे मिलते?

भास्कर सरकारी वजीफा पाने लगा था, फिर भी मैं अपने मालिक का शुक्रगुजार रहा हूँ कि उन्होंने भास्कर को सदा प्रोत्साहित करते हुए सारे खर्चे उठाये. दिवस जात नहीं लागत बारा! भास्कर ने पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय से एम.टेक किया. उसकी प्रतिभा को देख कर प्रशासन ने उसे पीएच.डी. करने के लिए सं.रा. अमेरिका में केलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में भेज दिया.

मेरी तो सारी सोच ही बदल गयी क्योंकि ये सब हमारी कल्पनाओं से परे की बात थी. भास्कर कई बार भारत आया और फिर लौट जाता रहा अब उसकी दुनिया अनंत हो गयी थी. इस बीच मैं अपनी नौकरी से रिटायर हो गया हूँ. मुझे यह बताते हुए शरम आती है कि मुझे पेंशन के रूप मे हर महीने मात्र ५०० रूपये मिलते हैं. यह पेंशन, फैमिली पेंशन वाली स्कीम से मिलती हैं, पर मेरा बेटा हमारी बड़ी पेंशन है, जो अपने वजीफे से लेकर स्टाइफंड की रकम के बड़े हिस्से को बचा कर नियमित मुझे देता रहा है.

दो साल पहले उसने स्विटजरलैंड की सरकार के एक बड़े प्रोजेक्ट में जोइन्ट डाइरेक्टर के पद पर नियुक्ति पा ली. भास्कर ने मुझे बताया कि इस नौकरी को दिलाने में उसके गाइड कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय मे फिजिक्स विभाग के डीन प्रो. अलबर्ट सात्र का हाथ था. वे स्विट्जरलैंड के ही रहने वाले हैं. भास्कर ने बिना लाग लपेट के हमको बताया कि उसने प्रो.अलबर्ट सात्र की इकलौती बेटी मेरी सात्र से चर्च में जाकर शादी कर ली है.  वे दोनों खुश हैं.

मैं यही सोच रहा हूँ कि भास्कर ने हमारे खानदान के घरजमाई नाम को पुन: सार्थक कर दिया है.
***

10 टिप्‍पणियां:

  1. Jee achchhe longon ko kishi jees kee kami nahi hoti, sab bhagwan ne banaya hai, madhyam koi ho, jisko jahan hona hai uhi rahega, pura sansar ek hai, Hamre chahane ya na chahne se kuchchha nahi hota,
    ye sachcahi, aap ke prastuti bahut achchhu hai, aapne mujhe gyan diya, uska dhanyabad

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  2. भावनाओं से भरा सुन्दर जीवन वर्णन !!

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  3. जीवन भी कैसी-कैसी करवटें लेता है -पर आपके शब्दों में देश की आवाज़ लगातार सुनाई देती है !

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  4. इतिहास खुद को दोहराता है .... यहाँ घर जमाई बन कर दोहरा दिया ..... रोचक प्रस्तुति

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  5. भाव जगत को आलोड़ित करती बेहतरीन संस्मरण नुमा प्रस्तुति साथ में दर्शन और स्वदेश प्रेम और घरजमाई जाति सूचक नाम का खुलासा .

    कृपया फसल "शैरों" की उगती है करें .

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  6. देशी घरजमाई तक तो राहत रही पर विदेशी घरजमाई बन जाने की बात पर सोच में पड़ा हुआ हूँ। क्‍या-क्‍या नहीं हो रहा इस भरी दुनिया में पर क्‍यूं ये हो रहा है इसका पता नहीं। सुन्‍दर वर्णन।

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  7. आज की ब्लॉग बुलेटिन क्यों 'ठीक है' न !? - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. इतिहास अपने को दोहराता है ,बहुत भावपूर्ण खुबसूरत रचना
    LATEST POST सुहाने सपने
    my post कोल्हू के बैल

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  9. रोचकता से भरा है जीवन, कैसे करवट बदलता है, पता ही नहीं चलता।

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