शनिवार, 13 जुलाई 2013

बकरी माई

हम दोनों पति-पत्नी का प्रारंभिक जीवन उत्तराखंड में अपने अपने गाँवों में बीता, जहां घरों में गाय या भैंस दुधारू जानवर जरूर रहते थे. हमें याद है कि शुद्ध दूध का स्वाद व गन्ध कितना मनभावन होता था. उसमें चीनी मिलाने की कभी जरूरत ही नहीं होती थी.

विवाहोपरांत जब हम राजस्थान के जिला बूंदी के लाखेरी टाउनशिप में रहने लगे तो यहाँ आसपास ग्रामीण आँचल में रहने वाले गूजर/गूजरियाँ दूध बेचने आया करते थे. सन १९६४-६५ में दूध का भाव एक रुपये में दो सेर हुआ करता था, पर उसमें आधा पानी मिलाया हुआ रहता था. कभी कभी बकरी के दूध की गन्ध भी आती थी.

ग्वार गाँव की तरफ से आने वाले कुछ दूधिये तो रास्ते में पड़ने वाले जंगली संडाल नाले का पानी भी डाल कर लाते थे. लोग कहते थे कि कई बार छोटे छोटे मेंढक के बच्चे भी उछलते हुए दूध में मिलते थे.

हमारा एक दूधिया कान्हा गूजर था, जिसने बरसों तक हमको दूध पिलाया. उसे जब भी भाव बढ़ाना हो तो दूध मे ज्यादा पानी डाल कर लाने लगता था.

जब हमारे परिवार की जनसंख्या में बढ़ोत्तरी हो गयी तो बच्चों के लिए शुद्ध दूध की उपलब्धता न होने पर चिंता भी किया करते थे. एक बार गाँधी जयन्ती पर बापू के बारे में अनेक संस्मरण-लेख छपे थे, जिनमें उनकी बकरी के दूध का गुणों सहित वर्णन था. हमने तय किया कि एक बकरी हमें भी पाल लेनी चाहिए. चारा पास में सब्जीमंडी में खूब उपलब्ध रहता था. बस्ती के अधिकतर मुसलमान परिवारों ने बकरा-बकरी पाल रखे थे. उनका बकराप्रेम ईद पर कुर्बानी देने के निमित्त भी होता था.

उन दिनों वहाँ दो तरह की बकरियां हुआ करती थी--एक देसी लम्बे लटके हुए कानो व  लम्बी टांगों वाली जो जंगल में चरने भी जाती थी (चरवाहे मासिक शुल्क लेकर चरा कर लाते थे), और दूसरी बरबरी बकरी, जिसे स्थानीय लोग अंग्रेजी बकरी भी कहते थे. ये चरने जंगल में नहीं जाती थी. कहते थे कि बरबरी बकरी खूब दूध देती है और उसके दूध से गन्ध भी नहीं आती है. बरबरी बकरी साल में दो जुडवां बच्चे भी दिया करती थी. मालूम हुआ कि जिसके पास भी बरबरी बकरी होती थी, वह उसे बेचने के लिए कतई तैयार नहीं होता था. उसके ‘पाठ’ (बच्चे) जरूर मिलते थे, जिनकी कीमत भी बहुत होती थी. पाठ के जवान होने और ब्याने-दूध देने तक का इन्तजार करना पड़ता था, लेकिन हमको सब्र नहीं था.

इसी बीच एक दिन कांकरा गाँव के जागीरदार ठा.धनुर्धारीसिंह हाड़ा अपनी बीमारी के सिलसिले में सलाह लेने मेरे पास आये. उनकी आँत में ट्यूमर था. (जो बाद में उनकी मृत्यु का कारण भी बना) बातों बातों में मैंने उनको अपनी बकरी-चाहना बता दी तो उन्होंने कहा, “मेरे बाड़े में एक दर्जन बकरियां ब्याई हुई हैं, जिसे पसन्द करो ले आइये.”

“कीमत?” मैंने पूछ लिया.

उन्होंने कहा, "एक बकरी कल ही मैंने १५० रुपयों में बेची है. आप १३५ रूपये दे देना.”

इस प्रकार सौदा होने पर उन्होंने अपने एक कारिंदे के साथ बड़ी सी काले रंग की बकरी व उसके छोटे बोकड़ पाठ को मेरे आवास पर उसी दिन भिजवा दिया.

पत्नी खुश, बच्चे खुश, और अड़ोस-पड़ोस वाले भी बकरी की बुलंद मिमियाहट से आकर्षित हुए बिना नहीं रहे. घर में उत्सव का सा माहौल था. मायूसी तब हुए जब शाम को बकरी ने एक पाव भी दूध पूरा नहीं दिया. एक मित्र से चर्चा की तो उसने बताया, “ये जंगल चरने वाली बकरी है, ये इतना ही दूध दिया करेगी. आप इसे अनाज खिलाओगे तो थोड़ा दूध बढ़ सकता है.”

छौना भूखा ना रह जाये इस बात की भी चिंता थी.

गेहूं और चना बकरी को नाश्ते के रूप में परोसा गया, जिसे उसने मिनटों मे चट कर डाला. इसलिए और अनाज दो तीन बार खिला दिया. नई जगह पर बिजली की रोशनी में आ जाने से (कांकरा गाँव में तब बिजली नहीं होती थी) बकरी रात भर चिल्लाती रही, न खुद सोई और न हमको सोने दिया.

अगली सुबह हमें उम्मीद थी कि दूध जरूर बढ़ कर मिलेगा पर उसने पिछली शाम से भी कम दूध दिया, और उसे भी लात मार कर गिरा दिया. एक नई समस्या ये हो गयी कि अनाज खाने से उसका पेट खराब हो गया, बरामदे में जहाँ हमने उसको बांध रखा था, पूरी जगह उसके पतले मल से आच्छादित हो गया.

शाम तक घर का माहौल ग़मगीन सा हो गया. बच्चे जरूर पाठ से खेलना चाह रहे थे, पर बकरी नहीं चाहती थी कि उसके बच्चे को कोई छेड़े. वह मारने के लिए अपना सर घुमाने लगी.

मेरी श्रीमती ने दर्द भरे स्वर में कहा, ‘बकरी पालना हमारे बस की बात नहीं है. हम तो कान्हा गूजर का लाया हुआ पतला दूध ही ले लेंगे. आप इसे वापस ठाकुर साहब के पास पहुँचा आओ.”

इस प्रकार पाठ को गोद में उठा कर बकरी की रस्सी खींचता हुआ मैं पैदल पैदल कांकरा गाँव तक गया. राह में बहुत से परिचित लोग भी मिले. मुझे एक बकरीपालक के रूप में देखकर विस्मय कर रहे थे. मेरी हालत पर हँस भी रहे होंगे.

अंत में जब मैं ठाकुर साहब से मिला और उनको सारी बात बताई तो वे बोले, “जा को काम, ताहि को साजे, और करे तो डंका बाजे." उधर बकरी का मिमियाना भी बन्द हो गया. वह खुशी खुशी अपने बाड़े में चली गयी. मैंने राहत की सांस ली और घर लौट आया.
***

4 टिप्‍पणियां:

  1. हम गाय पाले हुये हैं, सच कहा, बहुत लगना पड़ता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाकई .... पशु पालना भी आसान काम नहीं .... रोचक संस्मरण

    उत्तर देंहटाएं
  3. काम तो कोई भी आसान नहीं होता है.....मनोरंजक संस्मरण.....

    उत्तर देंहटाएं