शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

यारखां की यारी

पश्चिम रेलवे के सवाईमाधोपुर व कोटा रेलवे स्टेशनों के बीच एक लम्बे नाम वाला, पर छोटा रेलवे स्टेशन आता है, नाम है, "इन्दरगढ़ सुमेरगंजमंडी". एक समय था इन्दरगढ़ एक अलग रियासत होती थी.

रेलवे स्टेशन से करीब ४ किलोमीटर पश्चिम की ओर खड़ी पहाड़ी पर लाल पत्थरों से बना एक भव्य किला है, जो अब खाली पड़ा है. राजवंश की वर्तमान पीढ़ी किले के बाहर अपना महल बना कर रहने लगे हैं. अपने समय में यह किला अन्य रजवाड़ों की तरह ही गुलजार रहा होगा. यहाँ के एक राजा की यह कहानी है:

राजा जी अपने घोड़े पर सवार होकर शाम की सैर पर निकले. साथ में कुछ खास दरबारी व अंगरक्षक भी थे. जब वे किले के बाहर तालाब के किनारे पहुंचे तो देखा एक आदमी बन्दर पकड़ रहा था. उसके कब्जे में एक बन्दर आ चुका था, जिसे देख राजा जी को बहुत गुस्सा आया. वे न्यायप्रिय प्रजापालक तो थे ही, धार्मिक आस्थाओं वाले भी थे. उन्होंने घोड़े से उतर कर मदारी को अपने पास बुलाया और उसका नाम पूछा तो मदारी ने सलाम करते हुए कहा, “हुजूर, मेरा नाम यारखां है.’

राजा जी के तेवर देख कर यारखां की घिघ्घी बंध गयी. राजा जी ने कड़कती आवाज में फिर से पूछा, “तू किसका यार है?”

मदारी घबराहट में बोला, “मालिक, मैं इस बन्दर का यार हूँ.”

राजा जी ने कहा, “तू इसका यार है तो इसे इस तरह बांधकर क्यों पकड़ रखा है?”

यारखां राजा जी से आजिजी करते हुए बोला, “हुजूर, मैं इसको सलाम करना सिखाऊँगा.”

राजा जी उसकी चालाकी भरी बात समझ गए और चेतावनी भरे अंदाज में बोले, “हम अभी सैर करके आते हैं. तब तक तू इसे सलाम करना सिखा, अन्यथा तुझे सजा मिलेगी.” उन्होंने दो सिपाहियों को वहीं पर उसकी निगरानी करने के लिए छोड़ दिया.

यारखां जानता था कि राजा जी के कोप का मतलब क्या होता है. उन दिनों अपराधियों को ‘काठ’ पर खड़ा होने की सजा मिलती थी. दोनों पैरों को फटी हुई मोटी लकड़ी में फँसा कर घंटों खड़ा रखा जाता था. यह सजा बहुत कष्टकर हुआ करती थी.

जब राजदण्ड का भय होता है तो अपराध कम होते हैं. राजाओं के जमाने में सजा के मामलों में तुरंतदान होता था इसलिए अपराधी आज की तरह बेख़ौफ़ नहीं थे.

यारखां सिपाहियों की निगरानी में बन्दर पकड़ कर बैठा रहा. अब उसे छोड़ भी नहीं सकता था. वह सजा से बचने की तरकीब सोचने लगा. एक सूझ उसके दिमाग में आई. राजा जी के सैर से लौटने के ठीक पहले उसने अपनी चिलम सुलगा ली. जब चिलम खूब गरम हो गयी तो उसने गरम गरम चिलम को बन्दर के माथे पर टेक दिया. जलन होने पर बन्दर अपना हाथ तुरंत माथे पर ले गया. मदारी उसका हाथ माथे से हटाता था और वह फिर से अपना हाथ माथे पर ले जाता था.

राजा जी आये. उन्होंने सोचा कि ‘मदारी इतनी जल्दी बन्दर को सिखा नहीं सकता, झूठ बोलता है’. वे बोले, “क्या यारखां, सलाम करना सिखाया या नहीं?”

मदारी बोला, “हाँ, हुजूर देखिये आपको सलाम कर रहा है.” मदारी उसका हाथ माथे पर से हटाये और बन्दर फिर माथे पर हथेली ले जाये. यह देखकर राजा जी मुस्कुराए बिना नहीं रहे. यारखां के चतुराई पर उन्होंने उसे इनाम से भी नवाजा.
***

6 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक शिक्षापद्धति...हमारी सबकी हालत कुछ कुछ ऐसी ही तो है..

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(20-7-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  3. क्या बात, बढिया



    मेरी कोशिश होती है कि टीवी की दुनिया की असल तस्वीर आपके सामने रहे। मेरे ब्लाग TV स्टेशन पर जरूर पढिए।
    MEDIA : अब तो हद हो गई !
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/07/media.html#comment-form

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  4. रोचक .... मदारी की बुद्धि की दाद देनी पड़ेगी ।

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  5. बहुत बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति ..

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  6. यारखाँ आज राजनीति में बहुत हैं एक ढूंढोगे हजार मिलेंगे .इनके सरदार कपिविजयसिंह जी हैं आजकल एक रॉयल बन्दर को सलाम करना सिखा रहे हैं

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