मंगलवार, 9 जुलाई 2013

रक्तदान महादान

किसी व्यक्ति के शरीर में खून की कमी को पूरा करने के लिए अब से लगभग ४०० वर्ष पहले यूरोप में तत्कालीन चिकित्सकों के दिमाग में आया कि यदि जानवरों का ताजा खून मुँह द्वारा पिला दिया जाये तो वह सीधे मरीज के शरीर के रक्त में जा मिलेगा. एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति तब आज की तरह समृद्ध व वैज्ञानिक नहीं थी. रक्त ट्रांस्फ्यूजन या रक्तदान का प्रारंभिक इतिहास बताता है कि ये भ्रांतिपूर्ण तरीका बहुत प्रचलित था. बाद में एक कदम आगे बढ़ते हुए एक चिकित्सक ने भेड़ का ताजा खून एक मरीज की रुधिर सिरा में चढ़ा दिया तो मरीज की तुरन्त मौत हो गयी. फ्रांस के इस दुस्साहसी चिकित्सक को मरीज को मारने के जुर्म में मृत्युदंड दिया गया.

परन्तु यह विचार कि एक मनुष्य का रक्त दूसरे को चढ़ाया जा सकता है, ज़िंदा रहा. इस प्रकार के प्रयोग होते रहे. तब अलग अलग खून में ‘अग्लूटिनेसन’ (आपस में मेल) की क्रिया से अनजान रहने के कारण मरीज मरते भी रहे.सन १६७९ में पोप X1 ने रक्त ट्रांस्फ्यूजन पर प्रतिबन्ध लगा दिया.

आस्ट्रियाई जीव विज्ञानी व भौतिकविद कार्ल लेंडस्लाइडर (१४ जून १८६८ – २६ जून १९४३) ने रक्त में ‘अग्लूटिनेसन’ के आधार पर रक्त समूहों को A, B, AB और O ग्रुप्स में वर्गीकृत करके इस चिकित्सा विधा में क्रान्ति ला दी. क्रॉसमैचिंग करके ग्राह्य रक्त को खून की कमी के शिकार मरीज को दिया जाना सामान्य बात हो गयी. सन १९३० में कार्ल लेंडस्लाइडर को इस महान खोज के लिए नोबेल पुरुस्कार से नवाजा गया. अब हर साल १४ जून उनके जन्मदिन को विश्व रक्तदान दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है.

मनुष्य के शरीर में बहने वाले खून में श्वेत व लाल रक्त कोशिकाएं अरबों की संख्या में अपने अपने अनुपात में रहते हैं. लाल कणों में हीमोग्लोबिन रहता है, जो शरीर के तमाम उतकों का पोषण करता है. श्वेत कण एक तरह की अन्दुरुनी फ़ौज है, जो प्रतिरोधात्मक शक्ति बनाए रखती है. इनका सामंजस्य प्लेटलेट्स बनाए रखते हैं. ये ऐसा जटिल विधिविधान है, जिसे आसानी से नहीं समझा जा सकता है. रक्त के उपरोक्त ग्रुप्स के उपसमूह भी हैं. आज चिकित्सा विज्ञान बहुआयामी और विस्तृत हो चुका है. अनेक विधाओं में इसका अध्ययन किया जाने लगा है. रक्त देना और रक्त लेना पूर्ण सुरक्षित हो गया है.

एक बार के रक्तदान में ३५० ग्राम रक्त दिया जाता है, जो मात्र २१ दिनों में दुबारा शरीर में बन जाता है. वैसे भी हर तीन महीनों बाद पुराने रक्तकण मर जाते है और पित्त की थैली में चले जाते हैं, उनकी जगह यकृत (लीवर) द्वारा नए पैदा करने की प्रक्रिया जारी रहती है.

रक्तदान करने के लिए १६ से ६० वर्ष की उम्र के सभी स्त्री-पुरुष, जिनके शरीर का वजन कम से कम ४५ किलो भी हो तथा HIV या हेपेटाइटिस B या C से ग्रस्त ना हो; योग्य है.

रक्तदान के बारे में तरह तरह की गलत धारणाएं होती है कि ‘रक्तदान करने वाला कमजोर हो जाता है’, ‘उसकी रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम  हो जाती है’, आदि आदि. लेकिन ये सब भ्रांतियां हैं.

रक्तदान से मौत से जूझ रहे मरीज, दुर्घटना से ब्लडलॉस वाले लोग, आपरेशन करवाने वाले बीमार, अथवा ‘थैलीसीमिया’ ग्रस्त बच्चों की जान बचाई जाती है. अनुभव किया गया है कि बहुत प्रचार-प्रसार के बावजूद कम लोग इस पुण्य कार्य में अपना योगदान करने के लिए सहर्ष आगे आते हैं. कई सामाजिक सस्थानों के सदस्य व उद्योग समूहों में कार्यरत समझदार लोग इस विषय की गंभीरता को समझते हुए रक्तदान करने/कराने लगे हैं.

कुछ प्रोफेशनल खून बेचने वाले शराबी/नशेड़ी लोग जरूरतमंदों को खून उपलब्ध कराते हैं. इसमें दलालों का भी हिस्सा होता है किन्तु ये बहुत खतरनाक बीमारियों को निमंत्रण देने जैसा है क्योंकि इन पेशेवरों के खून में हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत कम रहता है तथा बीमारियों की जड़ निहित रहती है. अधिकृत ब्लड बैंक रक्त का परीक्षण और भंडारण करते हैं, जिसमें स्टरलाईजेशन का विशेष ध्यान रखना होता है. जिन थैलियों में रक्त लिया जाता है, उनमें उचित मात्रा में ऐंटीकोआग्युलेन्ट होना चाहिए. ये महत्वपूर्ण है कि संरक्षित रक्त भी ज्यादा लम्बे समय तक नहीं रखा जा सकता है.

कुछ अनधिकृत नकली खून के कारोबारी दलालों के मार्फ़त मौत की सौदागिरी करते हैं. इनसे सावधान रहना चाहिए.

चूँकि अस्पतालों में आवश्यकतानुसार खून की पूर्ति नहीं हो पाती है इसलिए इसके विकल्प के रूप में cells free heamoglobin solution का उपयोग कुछ देशों में होने लगा है. सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रीका ने इसको मान्यता दी है.

रेडक्रॉस सोसाइटीज तथा बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित ‘ब्लड बैंक’ इस क्षेत्र में प्रसंशनीय कार्य कर रही हैं. रक्तदान करने वाले बहुत से लोगों ने नियमित रक्तदान करने के अपने व्यक्तिगत रिकॉर्ड बनाए हैं. हमें अपने स्वजनों, मित्रों व साथियों को समय समय पर रक्तदान करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. ये मानवता की सेवा में बड़ा कदम होगा.
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6 टिप्‍पणियां:

  1. रक्तदान के इतिहास से परिचित कराती अच्छी पोस्ट

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए आभार!

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  3. रक्तदान का इतिहास और वर्तमान स्थिति पर बेहतरीन आलेख . रक्तदान के बाद दिए गए रक्त

    कीआपूर्ति अगले २ ४ घंटों में ही हो जाती है . अस्थियों का विकास विकास रफ़्तार से होंने लगता है .

    ॐ शान्ति .

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  4. अस्वस्थ और कमजोर लोगों से अच्छा हो कि स्वस्थ लोग रक्तदान करें।

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  5. सुन्दर आलेख एवं महत्वपूर्ण जानकारी !

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