रविवार, 16 दिसंबर 2012

छोटी सी 'बड़ी बात'

संन  १९६३-६४ में, मैं लाखेरी सीमेंट कर्मचारी बहुधन्धी सहकारी समिति (जिला बूंदी, राजस्थान) के प्रबंधकारिणी का अवैतनिक महामंत्री चुना गया. समिति का बड़ा कार्य-व्यापार था. कई उपभोक्ता वस्तुओं की ऐजेंसीज भी समिति के पास थी. डनलप कम्पनी द्वारा निर्मित साइकिल के ट्यूब-टायर कंट्रोल से मिला करते थे. समिति को हर महीने कुल ५० टायर-टयूब अलॉट होते थे. समिति की सदस्य संख्या तब लगभग १५०० थी. कस्बाई परिवेश में साइकिल ही मुख्य सवारी होती थी. इसलिए टायर-ट्यूब के लिए मारामारी होना स्वाभाविक था. निष्पक्षता बनाए रखने के लिए हमने तय किया कि इच्छुक ग्राहकों को लाटरी द्वारा चयन करके बेचे जाएँ और यह प्रयोग बहुत सफल भी हुआ. लाटरी में नाम आने के बाद यदि किसी ने किसी कारणवश अपना हिस्सा नहीं उठाया, तो उसे उस ग्राहक को दे दिया जाता था जो ज्यादा जरूरतमंद होता था. यह एक सामान्य प्रक्रिया हुआ करती थी.

इसके लगभग बीस वर्षों के पश्चात जब मैं कर्मचारी संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहा था, तो प्रमुख राजनैतिक पार्टियां पक्ष या विपक्ष में सक्रिय हो गयी. बड़े नेताओं के आने से चुनाव का माहौल गरमा गया. यद्यपि  उस चुनाव में भारी बहुमत से चुन लिया गया, पर एक छोटी सी ‘बड़ी बात’ मुझे आज भी पिछली पीढ़ी के लोगों की सरलता व सहज कृतज्ञता से अभिभूत करती है.

हुआ यों कि एक बुजुर्ग कामगार, श्री रामपाल (जो कि रिटायरमेंट के करीब थे), की माता का उसके गाँव में मतदान के दिन की पूर्व संध्या में देहावसान हो गया था. उन्हें तुरन्त अपने गाँव को प्रस्थान कर देना चाहिए था, पर नहीं उन्होंने अपने साथियों से कहा कि “मुझे पाण्डेय जी के पक्ष में वोट डाल कर ही जाना है क्योंकि उन्होंने मुझे तब साइकिल का ट्यूब-टायर दिलाया था जब मुझे उसकी सख्त  जरूरत थी.”

यह बात लोगों ने मुझे बाद में बताई. मुझे तो उनका टायर प्रकरण याद भी नहीं था और न मैंने उन पर कोई विशेष अहसान किया था. इधर जब भी मैं अहसान फरामोशी के किस्से सुनता-पढ़ता हूँ तो मुझे रामपाल जरूर याद आते हैं.
***

6 टिप्‍पणियां:

  1. गाढ़े समय में की गयी सहायता सदा ही याद रहती हैं।

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  2. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 17-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1096 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  3. बहुत ख़ूब!
    आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 17-12-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1096 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  4. Bin Maage moti mile. maange mile na bheek...Jab koi karya bina pratyasha k kiya jaata hai toh us karya ka fal nishchit roop se milta hai !

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  5. बढ़िया आद्र संस्मरण .एहसान हलाली हरेक को आती नहीं है यह एहसान फरामोसों का दौर है पहले लोग -नेकी कर दरिया में डाल ,का फलसफा लिए होते थे आपकी तरह .

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  6. बढ़िया आद्र संस्मरण .एहसान हलाली हरेक को आती नहीं है यह एहसान फरामोसों का दौर है पहले लोग -नेकी कर दरिया में डाल ,का फलसफा लिए होते थे आपकी तरह .

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