गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

सहधर्मिणी

चुन्नू के दादा,

आज तुम बहुत याद आ रहे हो. तुम्हारा पोता चुन्नू अब चन्दन मिश्रा हो गया है. वह अहमदाबाद, गुजरात से आगे कहीं वीरावल की किसी फैक्ट्री में बड़ा मैनेजर हो गया है. उसने बड़ी जिद की कि "दादी को अपने साथ ले जाऊंगा." मैं तो इसी पुराने घर में आपकी यादों को संजोये हुए हर त्यौहार, हर मौसम में आपकी अनुपस्थिति में भी आपको खुद के निकट पाती रही हूँ. आपको गए अब बीस वर्ष से भी अधिक हो गए हैं, लेकिन मुझे हर रोज सपनों में आपके दर्शन होते रहते हैं. आपका मुस्कुराता हुआ चेहरा और प्यार भरी निगाहें मेरी आँखों की पुतलियों में डबडबा कर घूमा करती हैं.

बेटा कुंदन भी मुझे इतनी दूर नहीं भेजना चाहता है. बहू रमा तो कतई विश्वास नहीं कर रही थी कि मैं अस्सी साल की उम्र में पोते-पतोहू के साथ जाने को राजी हो जाऊँगी.

सच तो यह है कि चुन्नू ने कहा कि गुजरात में द्वारिकाधीश व सोमनाथ के दर्शन करवाऊंगा, तो मन में एक भारी हिलोर उठने लगी. मुझे याद है कि आपकी भी बड़ी तमन्ना थी कि एक बार द्वारिकापुरी जाकर बांकेबिहारी के सिंहासन पर उनके दर्शन किये जाएँ, पर अस्वस्थता के चलते वहाँ नहीं जा पाए थे. इसलिए मैं आपकी अतृप्त इच्छा को पूर्ण करने के उद्देश्य से वहाँ जाकर कन्हैया के दर्शन करूंगी. अपने साथ आपकी एक जीवंत फोटो भी ले जाऊंगी, जिसको मैं देवता से साक्षात्कार करवाऊंगी. मुझे पूरा विश्वास है कि आप हर घड़ी मेरे साथ रहेंगे.

आपकी – चुन्नू की दादी
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2 टिप्‍पणियां:


  1. संवेदनाओं और पर्दगी सादगी का यह भी एक स्तर है .प्यार और समर्पण का यह शीर्ष है .चुन्नू की दादी .....चुन्नू की मार्फ़त अपने प्रेम को दोहराती है ...

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