रविवार, 9 दिसंबर 2012

बैठे ठाले - ३

नई गाड़ी चलाने का रोमांच कुछ और ही होता है. मैं अपने १९ वर्ष पुरानी मारुती ८०० को एक एक्सचेंज ऑफर के तहत बदल कर, नई नैनो सी एक्स लेकर, घर आया तो देखा घर के गेट पर एक नौजवान भिखारी जिसकी उम्र लगभग २०-२२ वर्ष रही होगी, अपनी ढोलक पर थाप देता हुआ सुरीली आवाज में कुछ गा रहा था. वह बिलकुल देसी ठाठ में था. कुर्ता, काली वास्कट, धोती, गले में गेरुए रंग का दुपट्टा और सर पर साफ़ सुथरी सफ़ेद गांधी टोपी. माथे पर चन्दन तथा गले मे कंठीमाला. मैंने देखा कि ढोलक की तनियों में उसने दस दस रुपयों के बहुत सारे नोट फंसा रखे थे जिसका सन्देश यह था कि वह दस रुपयों का नोट ही स्वीकार करता था या लोग इससे कम उसे दिया ही नहीं करते हैं.

कोई लूला-लंगड़ा हो, अपाहिज हो, तो संस्कारवश कुछ न कुछ उसके दानपात्र में डालने में मन को खुशी होती है, लेकिन एक हृष्ट-पुष्ट जवान भीख मांगे तो बहुत बुरा लगता है, चाहे वह किसी भी वेश में हो. मैं अक्सर ऐसे भिखारियों को डांट-डपट कर भगा दिया करता हूँ. इसी क्रम में मैंने उससे भिड़ते ही कहा, “तुम सब प्रकार से सक्षम और तंदरुस्त हो, तुम्हें भीख माँगते हुए शर्म नहीं आती?”

उसने दीनता से कहा, “साहब, मैं तो बचपन से यों ही भजन गाकर माँगता हूँ. मैं जोगी जाति से हूँ, माँगकर खाना हमारा पेशा है.”

इतने में मेरी श्रीमती अन्दर से पाँच रुपयों का सिक्का लेकर उसे देने के लिए आई तो मैंने उससे कहा, “मत दो इसे, इसकी आदत देने वालों ने ही खराब कर रखी है. इसलिये ये कोई काम नहीं करता है.”

“अरे, जाने भी दो, अब दरवाजे पर आस लेकर आया है,” कहते हुए उसको रूपये देने लगी तो माँगने वाले ने अपना स्वाभिमान दिखाते हुए तेवर बदल लिए और बोला, “मुझे नहीं चाहिए तुम्हारे रुपये.” इतना कह कर वह बिना पीछे मुड़े चल दिया और अगले घर के आगे ढोलक के साथ भजन गाने लगा. यद्यपि मैंने अपनी श्रीमती के सामने यह दर्शाने की मुद्रा बनाई कि उस भिखारी को भगाने का मुझे कोई अफसोस नहीं था, लेकिन मन ही मन मुझे बहुत ग्लानि हो रही थी कि दर पर आया भिक्षुक अस्वीकृति के साथ चला गया था.

मुझे संत कबीर का वह दोहा स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने लिखा है, “साईं इतना दीजिए जा में कुटुंब समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय."

यह सनातनी व्यवस्था है जिसमें भिक्षाकर्म को भी एक सीमा तक मान्यता दी गयी है. साधु-संत, फ़कीर या जोगी सभी साधिकार आज भी गाँव-घरों में भिक्षा के लिए आते हैं और समर्थ लोग इसे भी धर्म की व्यवस्था मान कर दान देते हैं. (यहाँ मैं उन साधु-मठाधीशों की बात नहीं कर रहा हूँ, जो दिखावा कुछ करते हैं, और पांच-सितारा सुविधाएँ भोगा करते हैं.)

मुसलमानों में भी ईद के पहले या बाद में जकात (दान) देने का प्रावधान है. वहाँ तो बकायदा आमदनी का दस प्रतिशत तय है, चाहे लोग उसका सही तरीके से पालन करें या नहीं, पर नियम प्रतिपादित है.

मूल बात, मैंने अपनी नई नवेली नैनो को गैरेज में डाल कर, घर में खुशियों की चाबियाँ लेकर प्रवेश किया और अपने लैपटाप पर अपनी डाक देखने की प्रक्रिया शुरू की तो फेसबुक पर अपने एक सुह्रद मित्र श्री राकेश सारस्वत द्वारा डाली गयी एक दिल को छूने वाली छोटी सी रचना पढ़ कर अभिभूत हो गया. मैंने राकेश जी को बहुत साधुवाद दिया कि बड़ी प्यारी व यथार्थ को बांचती हुई पन्क्तियाँ उन्होंने प्रेषित की हैं. रचना का आशय इस प्रकार है:
"जब घर में विलासिता के नाम पर सिर्फ एक टेबलफैन था, माँ जब रोटिया बनाती थी, तो पहली रोटी गाय की, और फिर घर के सदस्यों के लिए, तथा अंत में कुतिया के नाम की रोटी बनाती थी. अन्न में चींटियों, चिड़ियों, गिलहरियों का भी हिस्सा होता था. काली कुतिया के ब्याने पर तेल-गुड़ का हलवा खिलाया जाता था, पर आज घर में गाड़ी है, ए.सी. है, फ्रिज-टीवी-कंप्यूटर व तमाम आधुनिक फर्नीचर है, लेकिन यदि कोई भिक्षुक गुहार लगाये तो उसे केवल दुत्कार मिलती है. खिड़की से मात्र कर्कश आवाज बाहर निकलती है."
भावार्थ यह है कि पहले जब कुछ नहीं था तो सब कुछ था, और अब सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है.

इस रचना को पढ़कर मैं अपनी "खुशियों की चाबी" पर गंभीरता पूर्वक सोचने लगता हूँ कि यह वैचारिक  युगान्तकारी परिवर्तन हमें कहाँ ले जा रहे हैं और हमारे अंत:करण को अंत में  कितनी खुशी दे पायेंगे.
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3 टिप्‍पणियां:

  1. अब देख कर समझ आने लगा है कि कौन आदतन है और किसे आवश्यकता है।

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  2. पहले सारी बातें संस्कार में शामिल थीं .... आज यह सब दक़ियानूसी काही जाने लगी हैं । विचारणीय पोस्ट

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  3. ग्लानि तो होती है पुरुषोत्तम जी किन्तु ये भी एक सच है कि एक हृष्ट पुष्ट व्यक्ति भीख मांगे ये भी अच्छा नहीं लगता बहुत सार्थक प्रस्तुति आभार आत्महत्या-प्रयास सफल तो आज़ाद असफल तो अपराध [कानूनी ज्ञान ]पर और [कौशल ]पर .शोध -माननीय कुलाधिपति जी पहले अवलोकन तो किया होता .

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